Books

 

 

 

 

हमारे अब्बा – कुछ यादें

यासमीन खालिद रफी

 

“रफी साहब की बहू होने के नाते यासमीन तो उनसे जुड़ी जानकारियों का अहम और
खास ज़रिया रही हैं। उन्होंने यह किताब लिखकर यह साबित भी कर दिया कि परिवार
में लिखने के खासमखास गुण मौजूद हैं ।

वैसे तो वो मेरी भांजी हैं।

मुहम्मद रफी तो एक सूफी थे जो अल्लाह की बख्शी आवाज़ से गाने गाते थे। कभी
कोई दूसरा रफी हो ही नहीं सकता क्योंकि ऊपरवाला अपने खास करम दोहराता
नहीं।’

सलीम खान, मशहूर लेखक और मुहम्मद रफी के रिश्तेदार मेरे पति खालिद रफी

और हमारे अब्बा मुहम्मद रफी की याद में मेरे लाजवाब बच्चों
शबाना, फरहाना, रेहाना और राशिद के लिए शुक्रगुज़ार हूं

मरहूम पद्मश्री हाजी मुहम्मद रफी जैसी हस्तियां रोज-रोज पैदा नहीं होती हैं। ।980 में
इस अजीमतरीन गुलूकार की मौत के साथ ही फिल्‍मी गानों का एक खास दौर खत्म हो
गया। लेकिन रफी साहब के सदाबहार गाने आज भी उसी तरह उनके प्रशंसकों के
दिलों में धडकते हैं।

मुझे बहुत छोटी उम्र से ही रफी साहब के नगमों से बेहद लगाव रहा था। ये मेरी
खुशनसीबी है कि मैं रफी साहब के ही घर में उनकी बहू बनकर आई। उनके बेटे
खालिद रफी के साथ मेरी शादी हुई थी। लेकिन अफसोस कि रफी साहब के साथ मेरा
सिर्फ 1971 से 1980 तक ही साथ रहा। इस आर्से में मुझे उन्हें करीब से जानने-समझने
और सुनने का मौका मिला।

हालांकि मेरे पास मुहम्मद रफी की सुनहरी यादों का भंडार था, लेकिन फिर भी
मैंने कभी उनकी शख्सियत पर किताब लिखने का इरादा नहीं किया था। कहते हैं ना,
हरेक बात का एक वक्त मुकर्रर है।

जनवरी 2005 में दिल का दौरा पड़ने से मेरे शौहर की अचानक मौत हो जाने के
बाद बच्चों के साथ घंटों बैठकर घर के पुराने किस्से-कहानियों, यादों और बातों का
सिलसिला चला करता। ऐसे ही एक मौके पर मेरी बड़ी बेटी शबाना ने कहा, “मम,
आपको तो दादा अब्बा पर किताब लिखनी चाहिए।” उस वक्त मैं अपनी जिंदगी के
सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही थी, इसलिए मैंने बस सुना और धीरे से मुस्कराकर कह
दिया, “इंशाल्‍्लाह एक दिन।” लेकिन ये बात वहीं पर खत्म नहीं हुई। बच्चों के बार-बार
इसरार करने पर मैंने अपनी यादों को किताब की शक्ल देने का वादा कर लिया। फिर मैं
ये सोचकर परेशान होने लगी कि मैंने तो सालों से एक खत तक नहीं लिखा, किताब
कैसे लिख सकूंगी?

जब मैंने सन्‌ 2007 में इस किताब को लिखना शुरू किया तो मुझे यकीन ही नहीं
आता था कि ये हो क्या रहा है। बस ऐसा महसूस होता था जैसे कोई मेरा हाथ पकड़कर
मुझसे लिखवा रहा हो।

मैंने इस किताब में जिस दौर और माहौल का जिक्र किया है, तब से अब तक

बहुत कुछ बदल चुका है। इस किताब को पढ़ते वक्त बेहतर होगा कि उस दौर और
माहौल को ख्याल में रखा जाए।

रफ़ी परिवार
मुहम्मद रफ़ी
विलक़ीस रफ़ी

सईद रफ़ी ख़ालिद रफ़ी यु हामिंद रफ़ी शाहिद रफ़ी
जकिया रफ़ी यासमीन रफ़ी फ़ौजिया रफ़ी फ़िरदौस रफ़ी

परवीन अहमद नसरीन अहमद यासमीन अहमद
डॉ. आफ़ताब अहमद मेहराज अहमद परवेज अहमद

तेरा जाना

जुलाई 1980 लंदन में बच्चों के स्कूल की गर्मियों की छुट्टियां शुरू होने में करीब दो
हफ्ते बाकी थे। मैं हर ईस्टर, गर्मियों और सर्दियों की छुट्टियों में बच्चों के साथ हिंदुस्तान
चली जाती थी। साल के तीन चक्कर तो हिंदुस्तान के ज़रूर लगते थे, लेकिन अगर बीच
में मौका मिलता था तो भी हम चले जाते थे। मैं तो बस हिंदुस्तान जाने का बहाना ढूंढ़ती
रहती थी। बच्चों को भी हिंदुस्तान में बड़ा ही मजा आता था। हम आधी छुट्टियां मुंबई में
और आधी मेरे मायके इंदौर (म.प्र.) में गुजारते थे। हिंदुस्तान की सबसे अच्छी बात ये
थी कि मुझे लंदन की भागदौड़ की जिंदगी से कुछ दिनों के लिए अच्छा-खासा ब्रेक
मिल जाता था।

चूंकि इस बार रमजान का महीना भी जुलाई के दूसरे हफ्ते में शुरू हो रहा था और
मुझे रमजान में सफर करना पसंद नहीं है, जहां तक हो सके मैं अपने घर में ही रमजान
गुजारती हूं, इसलिए इस बार हमने तय किया कि रमजान और ईदुल-फ़ित्र का त्योहार
लंदन में ही मनाकर उसके बाद अगस्त के मध्य में दो हफ्तों के लिए मुंबई चले जाएंगे।

उस दिन सूरज डूबने के बाद से खालिद स्थानीय मस्जिद में बराबर फोन लगा रहे
थे, ये मालूम करने के लिए कि रमजान का चांद नजर आया कि नहीं। फोन बराबर
व्यस्त आ रहा था, काफी देर के बाद जाकर फोन लगा। फोन रखते ही खालिद ने मुझसे
कहा, “रमज़ान मुबारक, कल से रोजे शुरू।” और वो तरावीह की तैयारी करने चले
गए। मैंने भी घर वालों और मिलने-जुलने वालों को ये मालूम करने के लिए फोन लगाना
शुरू किया कि उनके एरिया में रमजान शुरू हुए या नहीं। भारत में बचपन में कभी-
कभी सुनते थे कि अलग-अलग शहरों में ईद अलग-अलग दिन मनाई गई। जब से लंदन
आई थी, भारत और लंदन का चांद भी कभी एक ही दिन नहीं निकला था। चार-पांच
घंटो के फर्क में कभी लंदन का चांद एक-दो दिन पहले निकल आता या फिर भारत का
एक-दो दिन बाद निकलता। लेकिन इंग्लैंड के शहरों में तो कुछ और ही हिसाब-किताब
देखा था। यहां पर तो एक ही शहर में दो या फिर तीन ईदें भी मनाई जाती थीं। और

आज तक भी यही हो रहा है। काश वो दिन जल्दी आए जब सारे इंग्लैंड में एक ही रोज
ईद मनाई जाए या फिर कम से कम एक शहर में तो एक ही दिन ईद मनाई जाए।

दूसरे दिन खालिद ने अम्मा और अब्बा (मेरे सास-ससुर, मुहम्मद और बिल्किस
रफी) को रमजान मुबारक कहने के लिए मुंबई फोन किया, लेकिन अम्मा ने बताया,
अभी तक यहां तो चांद नजर नहीं आया है, अब तो शायद कल ही पता लगेगा। खैर!
तुम सबको रमजान मुबारक।” मैंने और खालिद ने भी उन्हें रमजान की मुबारकबाद दी।
28 जुलाई 980 को खालिद और मैं सहरी के बाद नमाज पढ़कर सो गए थे।
तभी फोन की घंटी सुनकर आंख खुली, सुबह के आठ बजे थे। जैसे ही मैंने हैलो कहा,
दूसरी तरफ की आवाज सुनते ही समझ गई कि अब्बा का फोन है। “सो रहे थे क्या?”
उन्होंने पूछा। अब्बा के बात करने का तरीका बड़ा ही निराला था। सिर्फ काम की बात
करते, न उससे ज्यादा न कम, हर बात को बहुत आराम से और छोटा करके कहते।
कुछ इस तरह से कहते, “क्या? कब? कहां?” धीरे-धीरे मुझे भी उनका स्टाइल समझ में
आ गया था। उन्होंने पूछा, “सब कैसे हैं? खालिद कहां है?” खालिद ने मेरे हाथ से फोन
ले लिया। “कब आ रहे मुंबई, तुम सबकी याद आती है, बच्चे कैसे हैं? अच्छा, चलो मेरी
चीजों की लिस्ट लिख लो, परफ्यूम, कार पेंट, यार्डले सोप और दो डिब्बे मार्जरीन के
लेकर आना।” अब्बा मक्खन की जगह मार्जरीन खाना पसंद करते थे। खालिद ने पूछा,
“अब्बा, आपकी रिकॉर्डिंग कैसी चल रही है?”

“फर्स्टक्लास, बस डॉली (मेरा प्यार का नाम) के हाथ का खाना खाने का जी कर
रहा है। चलो ठीक, सो जाओ।”

3। जुलाई 1980। खालिद की उस दिन छुट्टी थी। जैसे ही मैं सोकर उठी, मैंने
खालिद की तरफ देखा और कहा, “मैंने बड़ा अजीब सा ख्वाब देखा रात को… अल्लाह
खैर करे।” उससे पहले न जाने मैंने कितने ख्वाब देखे होंगे जो सुबह तक याद भी नहीं
रहते होंगे या जिनका कोई मतलब भी नहीं निकलता होगा। लेकिन जब तक मैं 20-25

बरस की हुई, मैंने यह बात महसूस की थी कि जिन लोगों के साथ मेरा करीब का रिश्ता
है, या जिन्हें मैं बहुत प्यार करती हूं, उनके साथ अगर कोई हादसा होने वाला हो तो वो
मुझे ख्वाब के जरिए नजर आ जाता है। शुरू-शुरू में तो मुझे बड़ा अजीब सा लगता
था। और जो ख्वाब मैंने देखा होता, अगर वो सच हो जाता तो फौरन मेरे मुंह से
निकलता, “या अल्लाह! ये तो मैंने ख्वाब में देखा था।”

कई बार तो मुझे ख्वाब में सब कुछ साफ-साफ नजर आता और कई बार मैं
समझ नहीं पाती थी कि जो कुछ मैंने देखा है, उसका मतलब क्या है। उस रात भी जो
ख्वाब मैंने देखा था, उसे मैं ठीक से समझ नहीं पाई थी। मैंने देखा था, अब्बा एक ऊंची
इमारत से दूसरी ऊंची इमारत में जा रहे हैं और वो जहां पर भी जा रहे हैं, वहां भारी
भीड़ जमा हो रही है। तेज बारिश हो रही थी। मैंने ख्वाब का मतलब कुछ इस तरह से
समझते हुए खालिद से कहा, “मुझसे शर्त लगा लें, अब्बा फिर से मकान बदलने की
सोच रहे हैं, लेकिन मेरे ख्याल से अब उन्हें रफी विला (अब रफी मैंशन) नहीं छोड़ना
चाहिए।” फिर मैंने विषय बदलते हुए खालिद से कहा, “आधे से ज्यादा रमजान गुजर
गया, ईद भी अब दूर नहीं, मुझे शीरखुर्मा (सेवई) का सामान खरीदना है। चलें,
साउथहॉल जाकर ले आते हैं।

_________________________________________________________

मुझे साउथहॉल जाना बहुत अच्छा लगता था। भारत की याद ताजा हो जाती थी।
ऐसा लगता था जैसे मैं भारत के ही किसी साफ-सुथरे मुहल्ले में आ गई हूं जहां पर गोरे
भी घूम रहे हैं। उन दिनों साउथहॉल जाने का मजा ही कुछ और था, अच्छी-खासी
आउटिंग हो जाती थी। उस जमाने में आस-पास इतना अच्छा देसी सामान नहीं मिलता
था जो वहां मिल जाता था। भारत में मैं मिठाई बिल्कुल शौक से नहीं खाती थी लेकिन
यहां आकर मैंने खाना शुरू कर दिया था। इतनी मजेदार मिठाइयां तो मैंने भारत में भी
नहीं खाई थीं।

वो भी क्या दिन थे! महीने में एक-दो बार तो ज़रूर ही साउथहॉल जाकर
डोमिनियन, सेंचुरी या लिबर्टी सिनेमा हॉल में फिल्म देख लेते थे। भले ही लंदन में रहते
हों लेकिन बॉलीवुड फिल्मों का नशा ही कुछ और था! बच्चों के साथ फिल्‍म कैसे देखी
जाए, इसका भी इंतजाम कर लिया जाता। बाकायदा नाश्ता और दूध की बोतलें साथ
ले जाने को तैयार की जातीं जैसे पिकनिक पर जा रहे हों। सिर्फ हम लोग ही नहीं, उन
दिनों ज्यादातर लोग परिवार के साथ ही फिल्म देखने आते थे। सभी की यही परेशानी
थी कि बच्चों को कहां और किसके पास छोड़ा जाए। मजे की बात तो ये कि जब बड़े
फिल्‍म देख रहे होते थे, तो बच्चे सिनेमा हॉल में ही इधर-उधर भागते रहते। कभीदृकभी
रोने-चिल्‍्लाने की भी आवाजें आतीं लेकिन कोई इसको लेकर बुरा नहीं मानता था।

कोई डायलॉग ना भी सुनाई पड़ता तो कौन सी मुसीबत आनी थी। पिक्चर देख ली,
तसलल्‍ली मिल गई तो पाई-पाई वसूल हो गई।

छोटी उम्र से ही मुझे गाने सुनने और सिनेमा देखने का बेहद शौक था। चाहे
होमवर्क कर रही होती, बेडरूम में, रसोई में, कार में या फिर गार्डन में होती, रेडियो हर
वक्त बजता रहता। हालांकि मेरा बचपन मजहबी माहौल में गुजरा था। उसके बावजूद
भी रमजान के महीने में गाने सुनना, और कभी-कभी पिक्चर भी देख लेना हो जाता
था। अल्लाह माफ करे! ये सोचकर पिक्चर देखने चले जाते थे कि रोजा है, दिन जल्दी
गुजर जाएगा। लेकिन फिर लंदन आने के बाद मेरा रुख मजहब की तरफ ज्यादा हो
गया और इस बात का अहसास हुआ कि रमजान के महीने का ऐहतराम करना चाहिए
और इसमें जितनी इबादत की जाए, कम है। ये सोचकर मैंने रमजान में गाने सुनना
और पिक्चर देखना छोड़ दिया।

उस दिन सुबह जब मैं हॉल में नीचे आई, तो पता नहीं क्यों, ये जानते हुए भी कि
रमजान का महीना है, मेरी ख्वाहिश हुई कि गाने सुनूं। और मैंने अपने सैड सैन्ग्स के
संग्रह में से एक टेप लगाया और सुनने लगी। पता नहीं क्यों मेरा दिल बड़ा उदास हो
रहा था, और रोने का दिल कर रहा था। पहला गाना सुनते ही मैं अपने आप को रोक न
सकी और मेरे आंसू बहने लगे। गाने के बोल थे, जा रे जा रे उड़ जा रे पंछी, बहारों के
देस जा रे.. (गायिका लता मंगेशकर) फिर, जाता हूं मैं मुझे अब न बुलाना; मेरी याद भी
अपने दिल में न लाना… ये जिंदगी के मेले दुनिया में कस न होंगे… जाने वाले कभी
नहीं आते जाने वालों की याद आती है… तुम मुझे यूं भुला न पाओगे जब कभी भी
सुनोगे गीत सेरे संग-संग तुस भी गुनगुनाओगे.. (रफी साहब)। अगला गाना बजना
शुरू ही हुआ था, चल उड़ जा रे पंछी … कि खालिद ने आकर कहा, “रमजान में तुम
कब से गाने सुनने लगीं? वैसे मुझे भी आज कुछ अच्छा नहीं लग रहा है।”

“ओह, इसका मतलब हम लोग आज साउथहॉल नहीं जाएंगे।” खालिद ने कहा,
“नहीं, नहीं, मैं तुम्हें लेकर जाऊंगा, लेकिन शाम पांच बजे तक ज़रूर आ ज -एंगे।
तुम्हें मालूम है ना, आज जुम्मेरात है और शाम को मेरा बोलिंग गेम है।”

_________________________________________________________

खालिद को खेल-कूद में बहुत दिलचस्पी थी, देखना भी पसंद करते थे और
खेलना भी। क्रिकेट और टेनपिन बोलिंग के बड़े अच्छे खिलाड़ी थे। हर जुम्मेरात की
शाम को आठ से दस बजे तक एयरलाइन लीग में टेनपिन बोलिंग खेलने जाते थे।
किसी भी हालत में वो जुम्मेरात का खेल नहीं छोड़ते थे। मैं अक्सर उनसे मजाक में
कहती, “अगर कभी मैं जुम्मेरात के दिन मर गई तो क्या फिर भी बोलिंग खेलने
जाएंगे?” मुझे उनका सीधा-सच्चा सा जवाब मिलता, “अगर ऐसा हुआ तो तब की तब
देखी जाएगी।” बोलिंग उनकी चाहत थी, खेलकर उन्हें बडी संतुष्टि मिलती थी। खालिद

पेशेवर बॉलर भले ही ना हों लेकिन वो दुनिया की कई जगहों मसलन, मलेशिया,
हांगकांग, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड और पूरे यूरोप में बोलिंग खेलने गए थे।
खालिद हमेशा अपनी टीम के कैप्टन रहे और उन्होंने कई ट्रॉफियां भी जीती थीं।

उनके दो भाई सईद और हामिद बहुत अच्छे क्रिकेट खिलाड़ी थे। और वो दोनों
एयरलाइन लीग में टेनपिन बोलिंग भी खेलते थे। जब भी कभी तीनों की बीवियां
जकिया, फौजिया और मैं गेम देखने पहुंच जातीं तो हमारी आखें स्कोरबोर्ड पर ही जमी
रहतीं। किस का मियां सबसे अच्छा खेल रहा है? किसका कितना स्कोर हुआ, कौन सी
टीम जीत रही है? जब किसी का स्कोर कम होने लगता तो उसे मजाक में ताने मारे
जाते। “क्यों, क्या हुआ? आज खाना नहीं खाया, या फिर हारने की ही ठानकर आए थे
भैया?” वो भी क्या दिन थे। भुलाए नहीं भूलते।

उस रोज जब हम साउथहॉल से खरीदारी करके घर पहुंचे तो शाम के पांच बज
चुके थे। खालिद जब तक तीनों बच्चों को गाड़ी से उतार रहे थे, मैंने जाकर दरवाजा
खोला। मैंने अंदर कदम रखा, फोन की घंटी बज रही थी। मैंने जल्दी से जाकर फोन
उठाया।

“ऊअस्सलामु-अलैकुम।” “जी वालैकुमस्सनलाम, सब खैरियत है?” मैंने पूछा।
जवाब मिला, “हां बस, खालिद कहां है?” ये खालिद के सबसे बड़े बहनोई डॉ आफताब
अहमद थे जो सरे से फोन कर रहे थे। सरे हमारे विंडसर के घर से करीब एक घंटे दूर
है।

डॉ आफताब खालिद के खालाजाद भाई भी हैं। खालिद की बड़ी बहन परवीन
और मंझली बहन नसरीन, दोनों की शादी अम्मा की बड़ी बहन के लड़कों के साथ हुई
है। मुझे जरा फिक्र हुई। मैंने पूछा, “सब ठीक तो है, आप कुछ परेशान से लग रहे हैं?

“हम काफी देर से फोन लगा रहे थे, तुम लोग कहां थे?” उन्होंने कहा। तब तक
खालिद भी घर में आ चुके थे। मैंने इशारे से उन्हें बुलाया और रिसीवर उनके हाथ में दे
दिया। मुझे कुछ शक तो हो गया था कि ज़रूर कुछ खास ही बात है जो आफताब भाई
खालिद से ही करना चाह रहे हैं। मैं वहीं पास में खड़ी थी। मैंने देखा खालिद का चेहरा
कुछ उतर सा गया है। उनके चेहरे पर परेशानी नजर आने लगी। मैं समझ गई कि ज़रूर
कोई बुरी खबर है। मेरा दिल धक से हो गया, और मेरे मुंह से बेसाख्ता निकला, “या

अल्लाह, रहम करना।”

“लेकिन मेरी तो तीन दिन पहले ही उनसे बातचीत हुई थी, बिल्कुल अच्छे थे
खालिद ने ताज्जुब से कहा। उनकी आखों में आंसू थे और उनकी आवाज भर्रा गई थी।
मैंने फोन उनके हाथ से लिया और पूछा, “क्या बात है, आफताब भाई?”

“मुझे मुंबई से फोन आया है कि खालू की तबीयत दोपहर से खराब है, और उन्हें
मुंबई हॉस्पिटल ले जाया गया है।”

“अच्छा, आप फोन रखें, मैं अभी मुंबई फोन लगाती हूं” मैंने कहा। फोन रखने से
पहले वो बोले, “अच्छा सुनो, हम लोग भी तुम्हारे घर आ रहे हैं।”

खालिद बहुत घबराए हुए थे और बेहद परेशान लग रहे थे। मैं मुंबई फोन लगाने
लगी। उस वक्त मुंबई में रात के तकरीबन दस बज रहे थे। घर के नौकर खलील ने फोन
उठाया जो दिनो-रात “रफी विला’ में ही रहता था। खालिद ने पूछा, “सब लोग कहां
हैं?” उसकी आवाज में परेशानी साफ सुनाई दे रही थी। कहने लगा, “भाईजान, साहब
सुबह में बिल्कुल ठीक थे, उन्होंने नाश्ता भी बराबर किया था। सुबह में उनकी रिहर्सल
भी थी, बस दोपहर से कुछ तबीयत बिगड़ने लगी। दोपहर में साहब को सीने में दर्द सा
महसूस हुआ, कहने लगे, “गैस का दर्द मालूम होता है।’ मुझसे सोडा मिंट की गोली
मंगवाकर खाई। मैंने पूछा बाई (रफी साहब की शरीके-हयात, बिलकीस रफी) को जगा
दूं, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। बोले, “उन्हें परेशान मत करो।” साहब ने खाना भी
खाया, उसके बाद आराम कर रहे थे कि उनकी तबीयत अचानक फिर से बिगड़ने लगी।
उन्हें उल्टी भी हुई। फौरन ही डॉक्टर को घर पर बुलाया। पता नहीं डॉक्टर साहब ने क्या
समझा, उन्होंने साहब को फौरन अस्पताल ले जाने को कहा।”

खालिद ने कहा, “अच्छा सुनो, घर पर कौन है, फोन पर बुलाओ।” इतने में फोन
लाइन बिगड़ने लगी, और आखिर फोन कट ही गया। खालिद ने लाख कोशिश की
लेकिन फोन को न लगना था न लगा।

__________________________________________________________

कुछ ही देर में खालिद की बड़ी बहन परवीन बाजी और उनके शौहर आफताब
भी घर आ गए। उन्होंने आते ही बताया कि हमने सईद और हामिद को भी खबर कर दी
है। हमारी दोनों से बात हुई है, कह रहे थे एक घंटे में यहां आ जाएंगे। खालिद ने कहा
कि हम लोग निहायत परेशान हैं, न तो मुंबई फोन लग रहा है और न ही वहां से कोई
फोन आ रहा है। तीनों बड़े बेटे और एक बड़ी बेटी लंदन में थीं, और मुंबई में अम्मा के
पास दोनों छोटी बेटियां नसरीन और यासमीन, और सबसे छोटा बेटा शाहिद था जो
कुछ ही दिन पहले लंदन से मुंबई पहुंचा था।

“छह बज रहे हैं, अभी तक मुंबई से फोन क्यों नहीं आया? इस वक्त तो वहां रात
के साढ़े दस बज रहे हैं,” खालिद ने परेशान होते हुए कहा। “अरे, मुंबई हॉस्पिटल का
नंबर ले लेते हैं, वहीं से पता कर लेते हैं।” खालिद मुंबई में घर पर बराबर फोन लगाए

जा रहे थे। थककर कहने लगे, “आई डोन्ट बिलीव दिस! अब फोन इंगेज्ड आ रहा है।”
मैंने कहा मुझे फोन दीजिए। मैंने अपने मामू सलीम खां के घर फोन लगाया, किस्मत से
लाइन फौरन मिल गई। फोन मेरी मामी जान सलमा खां ने उठाया था। मेरे सलीम मामू
मशहूर स्टोरी राइटर्स की जोड़ी सलीम-जावेद में से हैं। ये मेरी मां के सबसे छोटे भाई हैं,
और इन दोनों को मैं बचपन से ही डुल्लू मामू और मामी जान कहकर बुलाती हूं।

“अस्सलामु-अलैकुम।” जवाब मिला, “वालैकुमस्सलाम।” इससे पहले कि मैं
उनसे कुछ पूछती, उन्होंने कहा, “क्या तुम लोगों को मालूम हुआ, हमने अभी सुना है
कि रफी साहब की तबीयत खराब है और उन्हें मुंबई हॉस्पिटल ले गए हैं।”

“हां, हां, हम लोगों को भी कुछ देर पहले ही पता चला है।” एक पल के लिए मैं
खामोश हो गई, और सोचने लगी, ज़रूर अब्बा की तबीयत ज्यादा ही खराब है,
इसीलिए रिश्तेदारों को भी इस बात का पता चल गया है। “मुझे मुंबई हॉस्पिटल का
फोन नंबर दे दीजिए,” मैंने कहा। नंबर मिलते ही मैंने मुंबई हॉस्पिटल फोन लगाया।
कुछ देर इंतजार के बाद लाइन मिली तो दूसरी तरफ से किसी औरत की आवाज थी,
“हैलो।” मैंने कहा, “मैं रफी साहब के यहां से बात कर रही हूं। हमारे किसी घरवाले को
फोन पर बुला दीजिए।” फोन की लाइन तो साफ थी लेकिन दूसरी तरफ से कोई जवाब
नहीं मिला। मैंने फिर से कहा, “हैलो। हैलो! क्या आप सुन पा रही हैं? मैं लंदन से बात
कर रही हूं।” मुझे लगा वो किसी और से भी कुछ बात कर रही थी। फिर वो धीरे से
बोली, “गैम, मैं माफी चाहती हूं।”

“क्या मतलब? किसी भी घरवाले को जल्दी बुला दें,” मैंने झुंझलाकर कहा।

“नहीं, मैम।”

“आप कहना क्या चाहती हैं?” मैंने गुस्से से कहा। मैंने महसूस किया उसकी
जबान लड़खड़ा रही है, वो सोच-सोचकर, रुक-रुककर बोल रही है। और फिर उसने
कहा, “गैम, मुझे माफ करें। रफी साहब नहीं रहे। वो थोड़ी देर पहले गुजर गए।”

“क्या…? नहीं…” मैं जोर से चिल्लाई, सुनते ही मेरा दिमाग सुन्न सा हो गया था।
मैंने सबकी तरफ देखते हुए कहा, “फोन पर औरत कह रही है रफी साहब नहीं रहे!”
हम चारों परेशान और बेबस से एक-दूसरे को तकते रह गए कि ये अचानक क्या हो
गया। “ये कैसे हो सकता है? ऐसा क्या हुआ होगा? मुझे तो यकीन नहीं आता, मैं मान
नहीं सकता कि ये बात सच है।” खालिद रो-रोकर कहे जा रहे थे। तभी आफताब भाई
ने ऊंची आवाज से दुआ पढ़ी, “इन्ना लिल्‍्लाहि वइ़न्ना इलैहि राजिऊन” (हम सब
अल्लाह के लिए हैं और उसी की तरफ लौटकर जाने वाले हैं)। ये दुआ जान या माल के
नुकसान पर पढ़ी जाती है। बाजी खालिद को गले से लगाकर तसलल्‍्ली दे रही थीं। अपने
दुख को बयान करने के लिए मेरे पास अल्फाज नहीं हैं। ये दुख हमारा तो था ही लेकिन

मैं सोच रही थी कि आज दुनिया भर में रफी साहब के करोड़ों चाहने वाले भी इस दुख
को महसूस कर रहे होंगे। उस वक्त तो बस ऐसा महसूस होता था कि हम इस दुख से
कभी उबर ही नहीं पाएंगे। लेकिन कहते हैं कि वक्त सबसे बड़ा मरहम होता है; वक्त के
साथ सब्र भी आ जाता है और दुख भी कम हो जाता है। लेकिन क्या इस नुकसान की
कभी भरपाई हो पाएगी? नहीं, कभी भी नहीं। कुछ वाकये ऐसे होते हैं जिनको हम
बदल नहीं सकते।

________________________________________________________

हम सब जानते थे कि अब्बा को पिछले पच्चीस साल से डायबिटीज और हाई
कोलेस्ट्रॉल की शिकायत थी जिसके लिए वो हमेशा दवा लेते थे। उनकी सेहत हमेशा
अच्छी रही, मैंने उन्हें कभी बीमार होते नहीं देखा, सिवाय कभी-कभार जुकाम-सर्दी या
बुखार होने के। इसके अलावा उन्हें कभी कोई तकलीफ नहीं रही, हमेशा एक्टिव रहे।
हां, वजन उनका बेशक ज्यादा रहा, जिसके लिए डॉक्टर उन्हें हमेशा वजन कम करने
की सलाह देते थे। लेकिन ऐसा करने में वो बेचारे नाकाम ही रहे। इसकी दो वजहें थीं,
एक तो अब्बा खाने के बेहद शौकीन थे, दूसरे उन्होंने किसी भी किस्म की वरजिश
वगैरा करना छोड़ दिया था। लेकिन इन सब चीजों से उनके काम पर कभी कोई असर
नहीं पड़ा। बस अल्लाह बचाए इन मूजी बीमारियों से, खासकर खाने के शौकीन लोगों
को। मुझे याद है अब्बा हमेशा खाने के बाद मीठे के लिए बेचैन हो जाते थे। चुपके से
मुझसे कहते ताकि अम्मा न सुन लें। “कुछ मीठा है तो दो।” अगर अम्मा सुन लेतीं तो
नाराज होने लगतीं। तो कहते, “अरे मीठा खाना तो सुन्नत (हजरत मुहम्मद सल्लललाहु-
अलैहि वसल्लम का अमल) है।”

अचानक हुई मौत जाने वाले के लिए भले ही आसान हो लेकिन पीछे रह जाने
वालों के लिए बहुत बड़ा झटका और इम्तेहान साबित होती है। इस इम्तेहान के लिए
हममें से कोई भी तैयार नहीं था। लेकिन हिम्मत से तो काम लेना ही था। कितनी अजीब
बात है: दुनिया की सबसे बड़ी सचाई है कि जो इस दुनिया में आया है वो किसी भी
वक्त और किसी भी दिन वापस जाएगा ही जाएगा, लेकिन इस सचाई के लिए तैयार
रहना तो दूर, हम कभी सोचते तक नहीं हैं।

सब कुछ सुनने के बाद भी खालिद को किसी तरह यकीन नहीं आ रहा था। वो
बराबर मुंबई घर पर फोन लगाए जा रहे थे, लेकिन लाइन बराबर मसरूफ थी। आखिर
थककर सोफे पर बैठ गए और कहने लगे, “मुझे अभी अम्मा से बात करनी है, न जाने
इस वक्त उनका क्या हाल होगा।” उसी वक्त फोन की घंटी बजी, और खालिद ने जल्‍दी

से रिसीवर उठा लिया। दूसरी तरफ छोटी बहन नसरीन थीं। “कहो ये खबर सच नहीं है
ना?” खालिद के मुंह से निकला।

“काश ये खबर झूठी होती, भाई जान!”

खालिद पूछ रहे थे, “अब्बा को हुआ क्या था?”

“भाई जान, हार्ट अटैक।”

“ऊअब्बा इस वक्त कहां है?” खालिद ने पूछा।

“अऊब्बा को हॉस्पिटल में ही रखा है, भाई जान।”

“मेरी अम्मा से बात करवाओ।” अम्मा फोन पर आई, तो पहले तो दोनों मां और
बेटा फोन पर खूब रोए, लेकिन फिर खालिद उन्हें समझाकर तसलली देने की कोशिश
करने लगे। वो कुछ कह भी रही थीं, लेकिन रोने और चिललाने की वजह से खालिद
मुश्किल ही से कुछ समझ पा रहे थे। अम्मा जनाजे के बारे में मशवरा करना चाहती थीं।
लेकिन फिर फोन कट गया।

हम लोग परेशान हाल सोच रहे थे कि क्या करें? किस तरह करें? कैसे होगा? अब
तो मुंबई जाने की पहली फ्लाइट जुमे की सुबह को ही मिल सकती है जो शनिवार को
पहुंचेगी। हम सबने आपस में तय किया कि जनाजे को रोककर रखना ठीक नहीं। एक
तो मुंबई में बारिश का महीना, फिर हद से ज्यादा गर्मी, और सबसे बड़ी बात कल जुमे
का दिन। मुझे इतना तरस आया जब खालिद ने बेबस होकर मेरी तरफ देखा और कहने
लगे, “हम कर भी क्या सकते हैं?” मैंने उन्हें तसलली देते हुए कहा, “सब्र और हिम्मत से
काम लें, इंशाल्‍्लाह सब कुछ ठीक ही होगा।”

फिर से फोन की घंटी बजी। इस बार खालिद के जहीर मामू थे। वो खालिद से
कह रहे थे कि अब्बा की मौत की खबर जंगल की आग की तरह चारों तरफ फैल गई
है, रफी विला के चारों तरफ लोग जमा होना शुरू हो गए हैं। वो जानना चाहते थे कि
अब क्या करें? खालिद ने कहा कि वो अम्मा से बात करना चाहते हैं। रोते-सिसकते
खालिद ने अम्मा से कहा, “जनाजे को रोककर रखना ठीक नहीं, कल ही तदफीन हो
जानी चाहिए। वैसे भी कल जुमा है। फिर अब्बा सिर्फ हमारे ही नहीं थे, उनके हजारों
चाहने वाले हैं।” खालिद ने आगे कहा, “अब्बा ने कभी किसी को तकलीफ नहीं दी, न
ही किसी को कभी बेजा इंतजार कराया, तो हम क्यों न उनकी बात का लिहाज रखें?”
खालिद लम्हे भर को खामोश हुए और फिर भर्राई आवाज में बोले, “लेकिन हम
बदनसीब न तो अब्बा की सूरत ही देख सकेंगे, और न ही उन्हें कंधा दे सकेंगे।”

कमरे में एक बार फिर से खामोशी छा गई। खालिद सोफे पर बैठे किसी सोच में
गुम थे। उसी वक्त हमारी सबसे बड़ी बेटी शबाना जो उस वक्त सिर्फ छह साल की थी,

खालिद की गोद में बैठकर पूछने लगी, “क्या दादा अब्बा अल्लाह के पास चले गए?
क्या वो अब मुझे गाने नहीं सुनाएंगे?” फिर खुद ही अपने सवाल का जवाब देते हुए
आगे बोली, “लेकिन हमारे पास तो दादा अब्बा के रिकॉर्ड हैं, हम जब भी चाहें उन्हें सुन
सकते हैं।” शबाना की बातों में कितना भोलापन और सचाई थी। अब्बा को बच्चों का
रोना बिल्कुल पसंद नहीं था। शबाना बचपन में अक्सर बेवजह रोया करती थी। मैं
परेशान होकर उसे आया को संभालने को दे देती। लेकिन जब अब्बा उसे रोता देखते,
तो फौरन अपने पास बुलाते, और अपनी जादू भरी आवाज में उसे गाना गाकर सुनाते।
शबाना इस बात की इतनी आदी हो गई थी कि जैसे ही अब्बा, ‘रे सा सा रेसायसारे हस
तो गए बाजार में लेने को आलू आलू-वालू कुछ न सिला पीछे पड़ा भालू.. ‘ गाते और
साथ-साथ हाथों से गाने पर एक्टिंग भी करते जाते, तो शबाना चुपचाप उन्हें सुनती
और फिर जोर से खिलखिलाकर हंस पड़ती।

___________________________________________________

खालिद के पास सोफे पर बैठे-बैठे अचानक मुझे ख्याल आया कि आज तो
जुमेरात है, खालिद की बोलिंग नाइट। जैसे उन्होंने मेरा दिमाग पढ़ लिया हो, फौरन उठे
और अपना बोलिंग बैग खोलकर बोलिंग बॉल निकाली और उसे पॉलिश करने लगे जो
वो हर जुमेरात को खेलने जाने से पहले करते थे। मुझे अजीब सा लगा; मैंने पूछा, “ये
आप क्या कर रहे हैं?” जवाब मिला, “मैं बोलिंग के लिए जा रहा हूं।”

क्यों?” मैंने पूछते हुए बॉल उनके हाथ से ली, और उन्हें बैठने को कहा। मैं समझ
गई कि खालिद इस वक्त सदमे और परेशानी से घबराए हुए हैं। खालिद बेहद नर्मदिल
इंसान थे और उन्हें दुख बिल्कुल बर्दाश्त नहीं था। मेरी तरफ देखकर बच्चों की तरह रोने
लगे; मैंने उन्हें बहुत समझाया और हिम्मत देने की कोशिश की, लेकिन फिर मैं खुद को
भी न रोक सकी। एक दूसरे से गले लगकर हम जोर-जोर से रोने लगे। बच्चे भी हमें
रोता देखकर घबरा गए, और वो भी जोर-जोर से रोने लगे। मैं खालिद की तकलीफ को
समझ रही थी। अचानक मां या बाप का साया सिर से उठ जाए, तो ऐसा खालीपन
महसूस होता है जैसे किसी ने सर से आसमान ही उठा लिया हो। जाहिर है खालिद के
दर्द के आगे मेरी तकलीफ कुछ भी नहीं थी। लेकिन हकीकत ये थी कि उस दिन मैंने
अपना बाप भी खोया था। अपना तीसरा बाप। मैंने बचपन से ही सुना था, और इस
बात को मानती भी हूं, कि इंसान की जिंदगी में तीन शक्ल में मां-बाप मिलते हैं। पहले,
जिन्होंने पैदा किया, पाला-पोसा; दूसरे, वो टीचर जिन्होंने पढ़ना-लिखना सिखाया; और
तीसरे, सास-ससुर जिनका दर्जा मां-बाप के बराबर होता है।

फोन की घंटियां बराबर बजे जा रही थीं। कई लोग हमसे घर पर आकर भी
मिलना चाहते थे लेकिन हमें सबसे माफी मांगनी पड़ी। हमारे पास इतना वक्त ही नहीं
था। बस एक ही बात दिमाग में घूम रही थी, कि जितनी जल्दी हो सके, हिंदुस्तान
पहुंचना है।

लंदन में रात के नौ बजने वाले थे, रोजा खोलने का वक्त हो रहा था। मैंने रसोई में
जाकर चाय बनाने के लिए केतली रखी। कुछ भी खाए-पिए बिना अठारह घंटे हो चुके
थे। मुंह बुरी तरह सूख रहा था लेकिन जैसे भूख और प्यास बिल्कुल मर चुकी थीं।
इफ्तार से पहले हम सबने अब्बा की मगफिरत (माफी) के लिए रो-रोकर दुआएं मांगीं ।
आंसू थे कि रुकने का नाम न लेते थे। दिल अभी भी इस बात को मानने को तैयार नहीं
था लेकिन अक्ल कहती थी कि ये सचाई है, और कि इस बात को मानना होगा और
सुबह के सफर की तैयारी करनी होगी। आफताब भाई और बाजी अपने घर के लिए
रवाना हो गए, ये कहते हुए कि सुबह एयरपोर्ट पर मुलाकात होगी।

जब से ये खबर सुनी थी लगातार रोते-रोते हमारी आंखें थक चुकी थीं। अब तो
ऐसा लगता था जैसे आंसू सारे सूख चुके हों। मैं रसोई के सिंक का सहारा लिए खिड़की
से बाहर बगीचे में देख रही थी। ये वो जगह थी जहां मैं अक्सर बरतन धोते-धोते अपनी
पुरानी यादों में खो जाती या फिर कभी अपने आप से बातें करने लगती थी। मैं अपने
आप से बातें करने लगी, “अब्बा चले गए, क्या ये सच है? या खुदा! मुझे यकीन ही नहीं
आ रहा है, हिंदुस्तान के अजीमतरीन गुलूकार मुहम्मद रफी नहीं रहे।” और फिर
झुंझलाकर गुस्से में बड़बड़ाई, “नहीं, नहीं, दुनिया के अजीमतरीन गुलूकार नहीं रहे।”

शुक्रवार एक अगस्त को घर से एयरपोर्ट के लिए रवाना होने से पहले खालिद ने
मुंबई फोन लगाया। मुंबई में सुबह के साढ़े दस बज रहे थे। नसरीन ने बताया कि अब्बा
को घर पर लाया जा चुका है और जनाजे की तैयारी शुरू हो गई है। खालिद फोन बंद
करके फिर जोर-जोर से रोने लगे। बेचैन होकर गुस्से से कहने लगे, “अब जाकर करेंगे
क्या? जब तक मुंबई पहुंचेंगे सब कुछ खत्म हो चुका होगा।” मैंने उन्हें समझाते हुए
कहा, “आपको हौसला रखना पड़ेगा। जरा सोचिए, अम्मा हम सबका कितनी बेचैनी से
इंतजार कर रही होंगी। चलिए, उठिए, वर्ना देर हो जाएगी।” इस मुश्किल सफर में बड़े
और बच्चे सब मिलाकर कुल अठारह लोग थे। हमारी फ्लाइट सुबह करीब दस बजे

लंदन से निकली, जो तकरीबन ग्यारह बजे रात मुंबई पहुंचने वाली थी। वक्त काटे नहीं
कटता था। बस यूं लगता था जैसे ये सफर कभी खत्म ही नहीं होगा।

शनिवार, दो अगस्त को मुंबई एयरपोर्ट पर हमें जहीर मामू और एक फैमिली फ्रेंड
चक्रवर्ती अंकल लेने आए। उनके साथ कुछ घरवाले और परिचित भी थे। घर पहुंचते-
पहुंचते रात का करीब एक बज गया। घर के नजदीक पहुंचे, तो देखा कि रात के
खामोश अंधेरे में भी रफी विला रौशन था। बारिश की वजह से चारों तरफ तिरपाल
लगा दी गई थी। मैंने देखा कि इतनी रात गए भी गेट के बाहर काफी लोग जमा हैं। ये
कौन लोग थे? इन्हें किसका इंतजार था? क्या जानना चाहते थे ये? हममें से कोई भी
नहीं जानता था। हम लोगों को गेट के अंदर जाने देने के लिए चौकीदार को लोगों को
वहां से हटाना पड़ा। गाड़ी की आवाज सुनकर खालिद के अंकल, बहनोई, छोटा भाई
और कुछ रिश्तेदार फौरन बाहर आ गए। जैसे ही हम लोग गाड़ियों से उतरे, घर में से
रोने-चिल्‍्लाने की आवाजें आने लगीं। घर के मेन दरवाजे से अंदर जाने को कहा गया।

___________________________________________________

नीचे हॉल में ही सब लोग हमारा इंतजार कर रहे थे। जैसे ही हम हॉल की तरफ
बढ़े, अम्मा की जोर से रोने की आवाज सुनाई दी, और उन्होंने कहा, “अरे, मेरे बच्चे आ
गए।” अम्मा का गम हम सब समझ रहे थे लेकिन आंसू बहाने और उन्हें तसल्लियां देने
के अलावा हम कर ही क्या सकते थे। घर का मेन हॉल लोगों से भरा हुआ था। लेकिन
घरवालों के सिवा वहां कोई भी मौजूद नहीं था क्योंकि अम्मा इद्दत में थीं। इद्दत में पति
की मौत के बाद किसी भी बेवा को चार महीने दस दिन तक घर में ही रहना होता है
और उसे गैर मर्दों से मिलना मना होता है। सईद, खालिद, हामिद जैसे ही घर में गए,
फौरन अम्मा को देखकर लिपट गए। उनको देखकर बेटा शाहिद भी जाकर लिपट गया
और चारों बेटे और मां खूब बिलख-बिलखकर रोने लगे। बाकी सब लोगों के भी आंसू
बह रहे थे लेकिन किसी से कुछ कहते नहीं बना।

एक के बाद एक बड़े और बच्चे सभी अम्मा से जाकर गले लगकर रो रहे थे। मुझे
अम्मा को देखकर बहुत दुख हो रहा था, और तरस भी आ रहा था। उनसे मिलने की भी
हिम्मत नहीं हो रही थी मेरी। लेकिन जैसे ही मेरे मिलने की बारी आई, और मैं आगे
बढ़ी, तो अम्मा ने मुझे जोर से पकड़कर गले से लगा लिया और रोते-रोते कहा, “अब्बा
की लाड़ली बहू! ये क्या हो गया?”

मैं भी उनके गले लगकर देर तक रोती रही, लेकिन उन्हें चुप कराने के लिए मेरे
पास अल्फाज नहीं थे। अम्मा रो-रोकर कह रही थीं, “मैं तुम्हारे अब्बा के बिना कैसे

रहूंगी, वो तो मुझे रानी बनाकर रखते थे, ये क्या हो गया?” इस बात में तो कोई शक
नहीं कि अम्मा ने वाकई रानी की तरह ही जिंदगी गुजारी थी। जो भी कहा वो फौरन
पूरा हुआ, और जो भी मांगा वो उसी वक्त मिल गया। हमेशा रिश्तेदारों से घिरी रहतीं जो
हर वक्त उन्हें खुश करने में लगे रहते। अगर अम्मा की हां तो सबकी हां, और अगर
उनकी ना तो सबकी ना।

आधी रात गुजर चुकी थी, लेकिन किसी की आंखों में नींद नहीं थी। हम लोग
जानना चाहते थे कि अचानक ये हादसा कैसे हुआ, लेकिन अम्मा की हालत देखकर
सभी खामोश थे। अम्मा रोते-रोते खामोश हो चुकी थीं। मेरे ख्याल से अपने सातों बच्चों
को अपने आस-पास बैठा देखकर उन्हें थोड़ी हिम्मत और सब्र आ गया था। खालिद के
कंधे पर सिर रखकर बोलीं, “काका (प्यार से हमेशा इसी नाम से बुलाती थीं), ये क्या हो
गया, तुम्हारे अब्बा तो अच्छे-खासे थे।” फिर ठहरीं, लंबी सांस ली और कहने लगीं,
“खैर, अल्लाह की मर्जी, वो जिस हाल में रखे। अब मैं ही तुम सबकी अम्मा हूं, और
अब्बू भी।”

अब्बा जब भी किसी को घर पर मिलने का वक्त देते, अपने मेहमान के आने से
पहले तैयार होकर खुद उनका स्वागत करते। वक्त के हमेशा बेहद पाबंद थे, उन्होंने
कभी किसी को इंतजार नहीं कराया। ये बात तो सभी जानते हैं कि बॉलीवुड की मशहूर
हस्तियों में ये खूबी लगभग न के बराबर ही पाई जाती है।

जुमेरात को भी सुबह नौ बजे घर पर रिहर्सल रखी थी। बंगाली संगीत निर्देशक
श्यामल मित्रा एक बंगाली गीत की रिहर्सल करा रहे थे। एक घंटे बाद, करीब दस बजे
वो रिहर्सल खत्म करके चले गए। अब्बा के साले, सेक्रेटरी और साथी जहीर बारी हर
सुबह सात बजे रफी विला आ जाते और सारा दिन अब्बा के साथ-साथ रहते, चाहे
रिकॉर्डिंग हो, रिहर्सल हो, प्रोग्राम हो या फिर कोई और काम हो। खाली वक्त में वो
अब्बा को दुनिया भर के किस्से सुनाते रहते। रफी विला में हर थोड़ी देर बाद जहीर मामू
के जोरदार ठहाकों की आवाजें गूंजतीं। उनकी लिखाई भी बेहद खूबसूरत थी। वो
डायरी में उर्दू में गाने लिखकर अब्बा को रिकॉर्डिंग के लिए दिया करते थे। ये कहना
गलत न होगा कि जहीर मामू और अब्बा का चोली-दामन का साथ था। लेकिन किस्मत
को कुछ और ही मंजूर था।

यहां मैं जहीर बारी साहब के बारे में कुछ और भी बताना ज़रूरी समझती हूं। वो
रफी साहब की जिंदगी का एक अहम हिस्सा थे। लंबा कद, गहरा रंग, काफी खूबसूरत

शख्सियत थे। राजेंद्र कुमार के वो बहुत बड़े प्रशंसक थे। यहां तक कि उनके पहनावे
और रहन-सहन में भी राजेंद्र कुमार की झलक दिखाई देती थी। खुद को किसी हीरो से
कम नहीं रखते थे। उन्हें फिल्मों में काम करने का भी शौक था। उन्होंने सन्‌ ।950 से
रफी साहब का काम संभाला था। हर लिहाज से दोनों में जमीन-आसमान का फर्क था।
उसके बावजूद भी उन्होंने रफी साहब के साथ उनकी आखरी सांस तक काम किया।
सारी फिल्म इंडस्ट्री ये बात जानती थी कि जहां रफी साहब, वहां जहीर। साये की तरह
हर समय उनके साथ-साथ होते थे। जहीर मामू की जिंदगी अब्बा के इर्द-गिर्द घूमती
थी। उनकी जिंदगी का मकसद, हर खुशी रफी साहब के साथ ही थी। यहां तक कि उन्हें
रफी साहब के साथ किसी की भी नजदीकियां पसंद नहीं आती थीं। अब्बा के गुजर
जाने के बाद उनकी जिंदगी बेमकसद और खोखली सी होकर रह गई थी। अब्बा के
जनाजे पर जहीर मामू रो-रोकर यही कह रहे थे, “साब, आप मुझे छोड़कर ऐसे कैसे जा
सकते हैं? आप तो हर जगह मुझे अपने साथ लेकर जाते थे। जब वहां पर सवाल-
जवाब होंगे, तो वहां भी जवाब देने के लिए वो मुझे ही ढूंढ़ेंगे।” ये गम जहीर मामू ज्यादा
दिन तक बर्दाश्त नहीं कर सके। अब्बा के गुजरने के एक साल बाद उनचास साल की
उम्र में अचानक दिल का दौरा पड़ने से उनका इंतकाल हो गया।

हमेशा साथ रहने वाले जहीर मामू उस दिन कुछ काम न होने की वजह से दोपहर
बारह बजे तक अपने घर चले गए। कुछ आधे घंटे बाद ही अब्बा को सीने और पेट में
भारीपन सा महसूस हुआ। उन्होंने सोचा कि बदहजमी होगी, इसलिए खलील से सोडा
मिंट की गोली मांगी। अम्मा सहरी करने के बाद नमाज और कुरआन पढ़कर सो गई
थीं। खलील ने पूछा भी कि क्या बाई को उठा दूं, लेकिन अब्बा ने ये कहकर मना कर
दिया कि उन्हें आराम करने दो। गोली खाने के पंद्रह-बीस मिनट बाद उन्हें कुछ आराम
सा आ गया। उसके बाद उन्होंने खाना खाया और हमेशा की तरह कुछ देर हॉल में बैठने
के बाद वहीं कारपेट पर लेटकर चार बजे तक आराम करते रहे।

कुछ देर आराम करने के बाद उन्हें फिर से दर्द सा महसूस हुआ। इस बार दर्द
पहले से कुछ ज्यादा था, इसलिए उन्होंने फौरन अम्मा को बुलवाया। पहले तो अम्मा को
कुछ समझ में नहीं आया। न ही खुद अब्बा कुछ समझ पा रहे थे। लेकिन जब उनकी
सांस में तकलीफ होने लगी, और होंठों पर नीलापन सा नजर आने लगा, तो अम्मा बुरी
तरह घबरा गई और उन्होंने फौरन अब्बा के निजी डॉक्टर के एम मोदी को फोन
लगाया। लेकिन बदकिस्मती से उनसे संपर्क नहीं हो सका, इसलिए एक लोकल डॉक्टर
चंद्रमणि को बुलवाया गया। इस बीच अब्बा को उलटी भी हुई। डॉक्टर ने उनकी अच्छे
से जांच करने के बाद उन्हें फौरन नेशनल हॉस्पिटल ले जाने को कहा। “रफी विला’ के
पीछे के दरवाजे पर अब्बा की मनपसंद कार नीली ऑडी लाई गई। इतना सब होने के

_________________________________________________

बावजूद अब्बा खुद चलकर घर से बाहर तक आए। उन्हें अलविदा कहने के लिए बड़ी
बहू जकिया जो छुट्टी के लिए अपने तीनों बच्चों के साथ मुंबई में थीं, छोटी बेटी
यासमीन जो उस वक्त चार महीने के गर्भ से थीं, घर के नौकर, चौकीदार सब वहां
मौजूद थे। अब्बा ने सबको मुस्कुराकर खुदा हाफिज कहा और छोटी बेटी यासमीन को
गले लगाकर तसलली दी, “घबराना मत, अब्बा इंशाल्लाह जल्दी वापस आएंगे।” अम्मा,
बेटी नसरीन और दामाद मेराज साथ में अस्पताल गए।

चार बजे के करीब अस्पताल पहुंचने पर पता चला कि वहां की लिफ्ट खराब है।
घरवालों ने स्ट्रेचर मंगवाया और अब्बा को सीढ़ियां चढ़ने को मना किया। लेकिन उस
वक्त तक अब्बा समझ नहीं पाए थे कि उन्हें क्या हो रहा है; खुद सीढ़ियां चढ़कर ऊपर
गए। वहां उनका ईसीजी किया गया। काफी देर के इंतजार के बाद मालूम हुआ कि
अब्बा को तो दिल का दौरा पड़ा था जिसके इलाज के लिए नेशनल हॉस्पिटल में कोई
भी सुविधा मौजूद नहीं है। वहीं से मुंबई हॉस्पिटल के इंचार्ज से बात की गई। उन्होंने
अब्बा को फौरन वहां लाने को कहा। यहां समझने वाली बात ये थी कि किसी को भी
वक्त की अहमियत समझ नहीं आ रही थी।

मुंबई हॉस्पिटल पहुंचते-पहुंचते शाम के सात बज चुके थे। वहां पहुंचते ही डॉक्टर
जे एल डागा ने उनका मुनासिब इलाज शुरू कर दिया। अब्बा के कमरे में अब्बा के
साथ अम्मा, नसरीन और मेराज पूरे वक्त मौजूद थे। अब तक अब्बा के जिस्म में कई
ट्यूब लगा दिए गए थे और डॉ के एम मोदी भी वहां पहुंच चुके थे। दोनों ही डॉक्टर
अब्बा पर नजर रखे हुए थे और उन्हें स्टेबल करने की कोशिशों में लगे हुए थे। बीच में
थोड़ी देर को तबीयत संभली भी और उन्होंने घरवालों से बातचीत भी की। बेटी नसरीन
उनके सिरहाने खड़ी यासीन शरीफ (कुरआन की एक दुआ) पढ़ रही थीं। थोड़ी देर बाद
अब्बा के सीने में फिर से तकलीफ होने लगी और सांसें उखड़ने लगीं। मेरे ख्याल से
बहुत देर हो चुकी थी, जो इलाज कई घंटे पहले मिलना चाहिए था, वो अब मिल रहा
था। अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद डॉक्टर अब्बा को स्टेबल नहीं कर पा रहे थे।
उनकी नब्ज डूबती जा रही थी। डीसी शॉक देने के लिए डीफिब्रिलेटर का भी इस्तेमाल
किया गया, लेकिन सब बेकार। और रात 10 बजकर 25 मिनट पर अब्बा हम सबको
और अपने करोड़ों चाहनेवालों को छोड़कर इस दुनिया से रुख्सत हो गए।

और घरवाले रोते-बिलखते खाली हाथ घर लौट गए, क्योंकि रात के वक्त
अस्पताल वाले मृत शरीर को घरवालों के हवाले नहीं करते थे। इसके बावजूद अजीब
बात ये थी कि इतने बड़े अस्पताल में शव को रखने के लिए मॉर्ग तक का इंतजाम नहीं
था। गर्मी की वजह से शरीर खराब न हो जाए, इसलिए रात भर बर्फ की सिल पर
बेसमेंट में रखा गया।

तीनों बेटे बार-बार यही सवाल पूछे जा रहे थे कि अस्पताल ले जाने को एंबुलैंस
क्यों नहीं बुलवाई गई? अब्बा को सीधे मुंबई अस्पताल क्यों नहीं ले जाया गया?
सीढ़ियां क्यों चढ़ने दिया गया? इतना वक्त क्यों बर्बाद किया गया? जब मालूम हो गया
था कि हार्ट अटैक हुआ है, तो फिर अब्बा को अस्पताल एंबुलैंस में क्यों नहीं ले जाया
गया? वगैरा वगैरा। सईद, खालिद, हामिद सवाल पूछे जा रहे थे, जानते हुए भी कि इन
सवालों के क्या जवाब हो सकते हैं? उस वक्त परेशानी की हालत में वही किया गया
होगा जो समझ आया।

क्या कहा जा सकता है? ये होना ही था। मौत के फरिश्ते को हुक्म मिल चुका था
कि अब इस महान गायक के दुनिया छोड़ने का वक्त आ चुका है, जिसने अपनी जादुई
आवाज से करोड़ों लोगों के दिलों पर राज किया था।

शुक्रवार पहली अगस्त को सुबह दस बजे अब्बा के शव को अस्पताल से रफी
विला लाया गया। रफी विला के कंपाउंड को चादरों से ढककर मय्यत को गुस्ल देने के
बाद कफन पहनाकर तैयार किया गया। उसके बाद घर के अंदर मय्यत को हॉल में,
इत्तफाक से, ठीक उसी जगह पर रखा गया, जहां अब्बा हमेशा और आखरी बार
आराम करने को लेटे थे। लेकिन अब रुख बदल दिया गया था। पहले जब अब्बा
आराम करने के लिए लेटते तो उनका सर काबे की तरफ और पैर दूसरी तरफ होते थे।
और अब उन्हें उत्तर में सिर और दक्षिण में पैर करके लिटाया गया था। मय्यत को हमेशा
इसी तरह लिटाया जाता है और कब्र में भी इसी तरह लिटाकर मुंह काबे की तरफ कर
दिया जाता है।

हमेशादूहमेशा के लिए अलविदा कहने का वक्त आ गया था। ये वो वक्त है
जिसका सामना दुनिया में आनेवाले हर इंसान को करना है। यहां से मां-बाप, भाई-
बहन, बेटा-बेटी, सास-ससुर, रिश्तेदार, यार-दोस्त सबका साथ छूट जाता है। आपके
साथ अगर कोई जाता है तो वो होता है आपका ईमान, आपकी इबादतें और आपके
करम। सबसे पहले अम्मा और सभी घरवालों ने अब्बा का आखरी दीदार किया। उसके
बाद रफी विला पहुंचने वाली फिल्म जगत की कई हस्तियों ने अपने साथी का आखरी
दीदार करके उन्हें अलविदा कहा। हम लोगों की बदनसीबी कि हम उस वक्त वहां
मौजूद नहीं थे। लेकिन वहां मौजूद सभी लोगों का यही कहना था कि रफी साहब जिस
तरह जिंदगी भर पुरसुकून दिखाई देते थे, उसी तरह अपने इंतकाल के बाद भी
पुरसकून दिखाई दे रहे थे। मेरे बाबा खालिद और बाकी सबको तसलली देते हुए कह

रहे थे, “रफी साहब जिस तरह ईमान, इज्जत और कामयाबी के साथ दुनिया में जिंदा
रहे, उसी तरह जुदा भी हुए।” उन्होंने बताया कि उनके चेहरे पर बेहद सुकून था और
हल्की सी मुस्कान बता रही थी कि दुनिया से जल्दी चले जाने का बुलावा आने का उन्हें
कतई गम नहीं था।

पचपन बरस की जिंदगी में अब्बा को वो सब कुछ हासिल हो गया जो लाखों में से
किसी एक इंसान को नसीब होता है। और इस बात के लिए उन्होंने हमेशा अल्लाह का
शुक्र अदा किया। मौत को भी कभी नहीं भूले। अक्सर बातों-बातों में कहते, “अब्बा के
लिए दुआ करो कि मौत बरहक (अटल) है, बस अल्लाह इसी तरह ईमान और इज्जत
के साथ जिंदगी गुजार दे, कभी किसी का मोहताज न करे, और कामयाबी और
बुलंदियों के साथ दुनिया से जाऊं।” जब भी कभी वो मेरे और खालिद के सामने ऐसा
कहते, तो खालिद फौरन कहते, “अरे, अब्बा, अभी तो इंशाल्‍्लाह आप अपने नाती-
पोतों की शादियां देखेंगे।” एक बार घर में बातों-बातों में उन्होंने कहा, “पता नहीं लोग
कब्र को पक्का क्यों करा देते हैं? हमारे हुजूर (पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब) तक की
कब्रे-मुबारक पक्की नहीं है।” इस्लामी उसूल के मुताबिक अब्बा की कब्र को कच्चा ही
रखा गया। इंतकाल के फौरन बाद ही सबकी राय से तय कर लिया गया था कि तदफीन
जुह्ठ मुस्लिम कब्रिस्तान में होगी।

__________________________________________________________

रफी साहब के जाने की चौंका देनेवाली खबर के फैलते ही पूरी हिंदी फिल्म
इंडस्ट्री जहां थी, वहीं थम गई। जो कोई भी सुनता यकीन नहीं कर पाता। रफी साहब
के हजारों कद्रदानों की भीड़ रफी विला के बाहर जमा होना शुरू हो गई। खबर सुनकर
फौरन पहुंचने वालों में नौशाद साहब, सलीम खां, जावेद अख्तर, दिलीप साहब और
लक्ष्मीकांत जी थे। सुबह से कई हस्तियां अपने साथी को श्रद्धांजलि देने रफी विला
पहुंच चुकी थीं जिनमें लता मंगेशकर, आशा भोंसले, उषा मंगेशकर, हेमलता, सुलक्षणा
पंडित, महेंद्र कपूर, किशोर कुमार, अमित कुमार, भूपेंद्र, मनहर, राहुल देव बर्मन, बप्पी
लहरी, कल्याण जी आनंद जी, सोनिक ओमी, कैफी आजमी, मजरूह सुल्तानपुरी,
हसरत जयपुरी, आनंद बख्शी, श्याम सागर, नकक्‍्श लायलपुरी, अनजान, सपन-
जगमोहन, जसपाल सिंह, प्रेमजी, जे ओमप्रकाश, रवि चोपड़ा, प्रसन्न कपूर, विनोद
मेहरा, अशोक कुमार… कितने ही लोग शामिल थे। एक ऐसा सिलसिला जो थमने का
नाम ही न लेता था। जो लोग किसी वजह से वक्त पर रफी विला नहीं पहुंच सके थे, वो
बांद्रा की बड़ी मस्जिद में पहुंचे। इसके अलावा हजारों की तादाद में लोग सुबह से ही
जुह कब्रिस्तान में जमा होना शुरू हो चुके थे।

करीब बारह बजे जैसे ही रफी विला से जनाजा उठा, चारों तरफ से रोने-बिलखने
की आवाजों के साथ-साथ कलल्‍मा-ए-तैयबा “ला इलाहा इल्लल्लाह, मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह’
की सदाएं भी बुलंद होने लगीं। बेतहाशा बारिश के बावजूद हजारों लोगों की भीड़
अपने चहेते गुलूकार को कंधा देने के लिए बेकरार थी। जनाजा बांद्रा की 28वीं सड़क
से वाटरफील्ड रोड और न्यू टॉकीज होते हुए बड़ी मस्जिद की तरफ जा रहा था। जिधर
नजर दौड़ाओ, लोग ही लोग नजर आते थे। कहीं इमारतों पर, तो कहीं पेड़ों पर चढ़े
लोग जनाजे की एक झलक पाने को बेताब थे। लोग बताते हैं कि इससे पहले मुंबई में
किसी जनाजे में इतने लोग नहीं पहुंचे थे। इस ऐतिहासिक घटना के लिए औपचारिक
ढंग से पुलिस का इंतजाम नहीं था, लेकिन जब हालात बिगड़ने की नौबत आने लगी,
तब पुलिस का इंतजाम करने को मजबूर होना ही पड़ा।

बड़ी मस्जिद पहुंचकर डेढ़ बजे जुमे की नमाज के बाद जनाजे की नमाज अदा
की गई। जनाजा तकरीबन ढाई-तीन बजे बड़ी मस्जिद से फिर से रवाना हुआ। लिंकिंग
रोड, खार के रास्ते जुहू कब्रिस्तान पहुंचते-पहुंचते लगभग साढ़े पांच बज चुके थे। जुहू
कब्रिस्तान पहुंचने से कुछ पहले मय्यत को ट्रक से उतार लिया गया। हजारों फैन अपने
प्रिय गायक के जनाजे को कंधा देने के लिए बेताब थे। बारिश, कीचड़, गर्मी, भीड़ के
बावजूद बड़ी से बड़ी और छोटी से छोटी फिल्‍मी हस्तियां रफी साहब के सम्मान में
कब्रिस्तान पहुंची थीं। दिलीप कुमार, राज कपूर, राजेंद्र कुमार, संजीव कुमार, सुनील
दत्त, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, अमजद खां, नितिन मुकेश, राकेश रोशन,
गुलजार, प्यारेलाल, रजा मुराद, नासिर हुसैन, सचिन, रामानंद सागर, सलीम खां…

छह बजे के करीब, आखरी दीदार के बाद जब उन्हें कब्र में उतारा जा रहा था, तो
सारी फिल्‍मी हस्तियां टूर खड़ी खामोशी से आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह को
दफ्न होते देख रही थीं, उस शख्स को जिसने अपनी जादू भरी आवाज देकर उनकी
कला में चार चांद लगा दिए थे। जैसे ही कब्र में मिट्टी डाली जाने लगी, लोग कराह उठे।
रोने-चिल्लाने की आवाजों से सारा माहौल गूंज उठा। अब फातिहा पढ़ा जा रहा था;
उधर अस्र की नमाज का वक्त हो चुका था। हजारों हाथ एक साथ अब्बा के लिए दुआ
करने को उठे हुए थे। उधर आसमान में सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था, और इधर सिर्फ
बॉलीवुड ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में अपनी आवाज से लोगों के दिलो-दिमाग पर
राज करने वाला सूरज मिट्टी में समा चुका था। ये लिखते-लिखते मुझे उनके गाए एक
गाने के बोल याद आ गए, दिल का सूना साज तराना ढूंढ़ेगा, मुझको मेरे बाद जमाना
ढूं़ेगा… लोग मेरे ख्वाबों को चुराकर ढालेंगे अफसानों में वक्त मेरे गीतों का खजाना
ढूंढ़ेगा…

उस रात जब हम पहुंचे तो सुबह के चार बजे तक बातें चलती रहीं। हम सब
थककर चूर हो रहे थे। दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया था। सारी बातें आखिर
वहीं जाकर खत्म होती थीं कि उस वक्त परेशानी के आलम में जो कुछ किया गया, जो
फैसले लिए गए, वही ठीक था। हॉल में कुछ देर को खामोशी हुई तो जहीर मामू बोले,
“चलो, बेटा, सब लोग उठो, सहरी का भी वक्त हो चुका है। तुम सब भी आराम करो
और अपनी मां से भी कहो, वो दो रातों से बिल्कुल सोई तक नहीं हैं।” हम सबने
मिलकर सहरी की, और फिर अपने-अपने कमरों में चले गए।

शनिवार, 2 अगस्त, नई सुबह के साथ आसमान में सूरज चढ़ चुका था। रफी
परिवार पर तो दुखों का पहाड़ टूटा था, सारा घर गम में डूबा हुआ था, लेकिन आसपास
की इमारतों में, और चारों तरफ अब्बा के ही गाने गूंज रहे थे। कहीं रेडियो पर तो कहीं
लाउडस्पीकर पर गाने बज रहे थे। बार-बार यही गाने सुनाई दे रहे थे। खुश रही अहले-
चमन हस ती चसन छोड़ चले… जाने वाले कथी नहीं आते जाने वालों की याद आती
है… ये जिदंगी के मेले दुनिया में कम न होंगे अफसोस हम न होंगे… तुम मुझे यूं भुला
न पाओगे जब कभी भी सुनोगे गीत सेरे संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे.. । सुबह सबसे
पहले सईद, खालिद, हामिद, शाहिद और कई रिश्तेदार मिलकर अब्बा की कब्र पर
फातिहा पढ़ने के लिए गए। इस बात में तो कोई शक नहीं कि मरनेवाले के लिए दुआ
तो दुनिया के किसी भी कोने से की जा सकती है लेकिन मेरी बड़ी ख्वाहिश थी कि
अब्बा की कब्र पर जाऊं। मगर पता चला कि जुहू कब्रिस्तान में औरतों के जाने पर
पाबंदी है। खालिद मुझे कब्रिस्तान के दरवाजे तक लेकर गए और कहा कि जिस कब्र
के पास खड़ा होकर मैं फातिहा पढुं, उसे यहीं से देख लेना।

कब्रिस्तान से लौटकर जहीर मामू ने खालिद को तसल्‍ली देते हुए कहा, “खालिद,
तुम हैडी का आखरी गाना सुनोगे तो हैरान रह जाओगे। तुम्हें यकीन नहीं आएगा। उस
गाने में रफी साहब की आवाज ऐसी कमाल की है और जोश ऐसा है कि कोई सोच नहीं
सकता था कि चार दिन बाद ही ऐसा हादसा हो जाएगा।” और इतना कहकर जहीर
मामू खालिद के कंधे पर सिर रखकर जोर-जोर से रोने लगे। ये आखरी गाना 26 जुलाई

1980 को फिल्‍म आसपास के लिए रिकॉर्ड किया गया था। इसके म्यूजिक डायरेक्टर
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल थे और गीतकार आनंद बख्शी साहब थे। गाने के बोल थे, शहर में
चर्चा है ये दुनिया कहती है गली में मेरी एक लड़की कुंआरी रहती है.. ये उन्होंने लता
जी के साथ मिलकर गाया था।

जब पता चला कि जनाजे की फिल्‍म को टीवी पर दिखाया गया था, तो मैं और
खालिद देखने को बेचैन हो गए। मैंने फौरन ही फोन करके पता करना शुरू किया।
जॉनी वॉकर साहब की बीवी नूर चाची के पास टेप था, जो उन्होंने रफी विला में हमारे
देखने के लिए भेजा। उसी शाम को हम सबने-अम्मा के सिवाय-जनाजे को टेप पर
देखा। देखने के दौरान भी हमारी आंखों से आंसू बहते जा रहे थे, लेकिन टेप खत्म होने
के बाद न जाने क्यों एक अजीब तसल्‍ली, एक सुकून सा महसूस हुआ। वाकई देखने
वालों ने ठीक कहा था, जैसा जनाजा रफी साहब का देखा वैसा जनाजा आज तक
किसी का नहीं देखा।

__________________________________________________

दिन गुजरते गए, रमजान का महीना पुरसकून ढंग से बीत गया। रफी विला में
ईदुल-फित्र मनाई गई, हालांकि अब्बा के बगैर वो बात नहीं रही थी और न ही वो बात
अब कभी वापस आने वाली थी। उस दिन हम इस गाने को कितनी ही बार सुनते रहे,
ईद का दिन तेरे बिन है फीका, आजा आजा कि दिन है खुशी का; हम अकेले और ये
मेले ईद है और तेरी याद है.. । ये दुख तो हम सबका था जिसे हम सबने अपने-अपने
तरीके से सहा लेकिन मैंने महसूस किया कि खालिद को इस दुख से उबरने में बहुत
वक्त लगा। कई साल बाद तक भी जब वो कोई नया साज देखते, तो फौरन उनके मुंह
से निकलता, “अब्बा को कितना पसंद आता।” अक्सर अब्बा के गाने सुनते हुए कहते,
“वाह अब्बा जियो।” जब मैं उनकी तरफ देखती तो कहते, “क्या गलत कह रहा हूं, जी
तो रहे हैं।”

यकीनन, अब्बा हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन वे अपने गाए गानों में हमारे लिए
हमेशा जिंदा रहेंगे। दुनिया में ऐसी कोई जगह नहीं जहां उनके गाए गीत ना सुने जाते
हों। हालांकि उनको गुजरे तीस साल से ज्यादा बीत चुके हैं लेकिन समय के साथ उनकी
लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। उनके जाने के बाद कई गायक आए और कडइयों ने उनके
नक्शे कदम पर चलने की कोशिश भी की लेकिन उन सब में आज भी उन्हीं की गायकी
और आवाज का जादू चलता है। बचपन से ही उनकी आवाज और उनके गाने के

अंदाज ने मुझे लुभाया। आज भी उनके गाए गीत सुनकर मेरे रोंगटे खड़े जाते हैं। मैं
हमेशा से मुहम्मद रफी साहब की फैन थी और आज भी हूं और हमेशा रहूंगी।

उनकी तारीफ में यही कहना चाहूंगी-चमन तो बेशक न हुआ खाली, पर अब वो
बहार कहां जो आप लेकर आए थे यहां।

सिलसिला-ए-हस्ती

ये किस्सा हिंदुस्तान के बंटवारे से पहले का है। अब्बा का खानदान बहुत खुशहाल,
पुराने ख्यालात का और मजहबी माहौल वाला था। इस बात का अंदाजा तो अब्बा के
उठने-बैठने, रहन-सहन, सोच और बातचीत के तौर-तरीके से ही हो जाता था। उनके
वालिद का नाम हाजी मुहम्मद अली और वालिदा का नाम अल्लाह रकक्‍्खी था। इन दोनों
की आठ औलादें थीं जिनमें छह लड़के मुहम्मद शफी, मुहम्मद इब्राहीम, मुहम्मद दीन,
मुहम्मद इस्माईल, मुहम्मद रफी और मुहम्मद सिद्दीक थे, जबकि दो लड़कियों रेशमा
बीबी और चिराग बीबी का इंतकाल बहुत पहले हो चुका था। अब्बा की उम्र अभी कम
ही थी कि 1948 में उनकी वालिदा का साया उनके सिर से उठ गया। हाजी मुहम्मद
अली साहब का मकान भाटी गेट लाहौर में था, जहां वो अपने खानदान के साथ रहते
थे। उनका अच्छा-खासा केटरिंग बिजनेस था, जिसके व्यंजन बड़े मशहूर थे और उनकी
चर्चा दूर-दूर तक होती थी।

मुहम्मद रफी साहब की पैदाइश 24 दिसंबर 1924 को अमृतसर के पास एक छोटे
से गांव कोटला सुल्तान सिंह में हुई थी। इत्तफाक से उन दिनों उनकी मां इस गांव में
अपने कुछ रिश्तेदारों के यहां मिलने के लिए आई हुई थीं। उसी दौरान रफी साहब का
जन्म हो गया। मैं यहां ये भी बता टूं कि ये बात कोई नहीं जानता कि ये रिश्तेदार कौन
थे, किस नाम से जाने जाते थे, या इनकी रिहाइश कोटला सुल्तान सिंह में किस जगह
थी। यहां तक कि अब्बा ने भी कभी इस बात का जिक्र अपने बच्चों तक से नहीं किया।

आज तक ऊअब्बा की पैदाइश को लेकर दो राय बनी हुई हैं। अब्बा ने हमेशा अपनी
पैदाइश कोटला सुल्तान सिंह में बताई, लेकिन उनके गुजर जाने के बाद पाकिस्तान में
उनके परिवार ने भाटी गेट, लाहौर को ही उनकी पैदाइश की जगह बताया।

अब्बा नौ साल की उम्र तक अपने परिवार के साथ भाटी गेट में ही रहे, उसके बाद
वो सब बिलाल गंज, लाहौर में रहने चले गए। बचपन से अब्बा को घर पर मजहबी
तौर-तरीके सिखाए गए थे। इसके अलावा थोड़ी सी शिक्षा भी दी गई। लेकिन उनका

झुकाव बचपन से ही गायकी की तरफ रहा। बातों में जब भी जिक्र निकलता, तो अब्बा
बताते, “शुरू से ही मेरा दिल गाने के सिवा किसी और काम में लगता ही नहीं था। मुझे
तो बस ऐसा लगता था कि जैसे अल्लाह ने मुझे सिर्फ यही एक हुनर देकर दुनिया में
भेजा है।”

उनसे पहले चौधरी खानदान में न तो किसी को गाने-बजाने का शौक रहा था और
न ही किसी ने कभी इस पेशे को अपनाया था। न ही रफी साहब में कभी अपनी
औलादों में से किसी को इस पेशे की तरफ लाने का रुझान रहा। मेरे ख्याल में तो
मुहम्मद रफी साहब दुनिया के पहले ऐसे कामयाब गायक होंगे जिन्होंने अपने किसी भी
बच्चे को अपने नक्शे-कदम पर चलाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने सिर्फ महेंद्र कपूर
साहब को कुछ अर्से तक गीत-संगीत की तालीम ज़रूर दी थी।

दस साल की छोटी सी उम्र से ही उन्हें अपने मुहल्ले के एक फकीर की आवाज
इतनी भाती थी कि वो उसकी गाई गजल को सुनने के लिए उसके पीछे-पीछे चलते थे।
और सुनने के बाद खुद भी वही गजल गाने लगते। उस गजल के बोल थे, खेदन दे दिन
चार… (खेल और मस्ती के चार दिन)। उनके गाने को सुनकर, और उनकी लगन और
शौक को देखकर फकीर उन्हें बहुत दुआएं देता था।

अब्बा शुरू से ही पीर-फकीरों को बहुत मानते थे। वो इस बात में बड़ा यकीन
रखते थे कि उनकी इज्जत और खिदमत करके दुआएं लेनी चाहिए; न जाने कौन सी
दुआ कब काम आ जाए। अब्बा को इस बात से भी हमेशा बड़ा डर लगता था कि किसी
का दिल दुखाकर उसकी बददुआ ली जाए।

धीरे-धीरे घर के लोगों को इस बात का अहसास होने लगा कि रफी की आवाज
कोई मामूली आवाज नहीं है, इसमें कुछ खास बात तो ज़रूर है। लेकिन इसके बावजूद
उनके घरवालों ने गाने-बजाने का सख्ती से विरोध किया और ये कहकर उन्हें रोकने की
कोशिश की कि ये मीरासियों का पेशा है, इसे बिरादरी में सब बुरा समझते हैं। लेकिन
रफी साहब गाने-बजाने से कभी बाज नहीं आए। रफी साहब के बड़े भाई का लाहौर में
हेयर कटिंग सैलून था। वो उन्हें अपने साथ दुकान पर ले जाने लगे ताकि वो वहां पर
काम सीख सकें। लेकिन वहां भी उनका दिल काम में नहीं लगता था। वो वहां भी
किसी न किसी चीज को बजाकर गाना शुरू कर देते थे। उन्हें किसी और काम में
दिलचस्पी ही नहीं थी। अपने भाई के बढ़ते हुए शौक को देखकर, मुहम्मद दीन ने
सबकी मर्जी के खिलाफ उन्हें मौसीकी की तालीम दिलवाने का इरादा कर लिया। इसके

बाद उन्होंने इस काम में अपने छोटे भाई की हर तरह मदद की। इस तरह ये सिलसिला
शुरू हुआ और आगे ही बढ़ता गया। शुरू में बरकत अली साहब से कुछ समय सीखने
के बाद रफी साहब ने छोटे गुलाम अली साहब की भी शागिर्दी की। उनके दूसरे उस्तादों
में किराना घराने के अब्दुल वहीद खां साहब, बड़े गुलाम अली खां साहब, जीवनलाल
मट्टू के बेटे जवाहरलाल मट्टू और फीरोज निजामी भी शामिल थे।

_____________________________________________________

इसी तरह कई साल गुजर गए, और अब मुहम्मद रफी गायकी के लिए पूरी तरह
से तैयार हो चुके थे। अब उन्हें इसी पेशे में आगे बढ़ने की धुन सवार थी। उन्होंने लोगों
के घरों में मुख्तलिफ मौकों पर और महफिलों में गाना शुरू कर दिया। जहां भी वो गाते,
लोग उन्हें बेहद पसंद करते। इसी दौरान उन्हें लाहौर रेडियो पर भी गाने का मौका मिल
गया। एक बार मुझसे बातचीत के दौरान बड़ी सादगी के साथ बोले, “लोग मुझसे पूछते
हैं… लेकिन मैं उन्हें अपने बारे में क्या बताऊं? मुझे तो बस बचपन से ही गाने का
बेइन्तहा शौक था। इसके लिए मैंने जी-जान से मेहनत की है और तकलीफें भी बहुत
उठाई हैं। बस अल्लाह की मुझ पर मेहरबानी रही, लोग मिलते गए और मेरा काम
बनता गया।

सन 1937 में, जब रफी साहब की उम्र महज तेरह बरस थी, तो एक ऐसा वाकेया
हुआ जिसे उनके कैरियर का सबसे पहला अहम मोड़ कहा जा सकता है। लाहौर में
ऑल इंडिया नुमाइश में संगीत-कार्यक्रम रखा गया था जिसमें कई नए और अच्छे
गायकों के साथ उस दौर के मशहूर गायक कुंदनलाल सहगल और गायिका जोहराबाई
अंबालेवाली भी शामिल थीं। हजारों की तादाद में संगीत प्रेमी अच्छे गुलूकारों को सुनने
के लिए वहां जमा थे। रफी साहब जो कि खुद कुंदनलाल सहगल को पसंद करते थे
और उन्हें सुनना चाहते थे, अपने भाई मुहम्मद दीन के साथ वहां आए हुए थे। कार्यक्रम
अभी जारी था कि अचानक बिजली चली गई, लोग बगैर लाउडस्पीकर के कुंदनलाल
सहगल को सुन नहीं पा रहे थे। इन हालात में भीड़ ने हंगामा शुरू कर दिया और वहां
का माहौल खराब होने लगा। इस मौके पर अचानक मुहम्मद रफी को गाने के लिए
स्टेज पर भेज दिया गया। फिर क्या था, रफी साहब ने इस मौके का भरपूर फायदा
उठाया। उन्होंने बगैर माइक्रोफोन के ही अपनी बुलंद आवाज में एक पंजाबी लोकगीत
गाना शुरू किया और समां बांध दिया। लोग हैरान रह गए। शोर-गुल का माहौल कुछ
ही लम्हों में सन्नाटे में तब्दील हो गया। लोग अपनी-अपनी जगहों पर रफी साहब की
आवाज के जादू में बंधे उन्हें सुनते रहे। उस दिन इस अनजान रफी को बहुत पसंद
किया गया। लोगों की तालियों से सारा माहौल गूंज उठा। कुंदनलाल सहगल भी रफी

को सुनकर हैरान थे और बेहद खुश भी। उस दिन उन्होंने नन्हे रफी के सिर पर हाथ
रखकर शाबाशी दी और कहा कि तुम एक दिन बहुत बड़े गायक बनोगे।

और कुछ ही सालों के अंदर सहगल साहब की कही हुई बात सच साबित हो गई।
मुहम्मद रफी इतने बड़े गायक बने कि सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं बल्कि दुनिया के कोने-
कोने में उनकी आवाज गूंजी और आज दुनिया से उनके कूच कर जाने के तीन दशक से
ज्यादा बीत जाने के बाद भी उसी तरह गूंज रही है।

गीत-संगीत रफी की जिंदगी बन चुका था। अब पीछे पलटकर देखने का तो
सवाल ही पैदा नहीं होता था। उन्हें दिन-रात बस गाने और रियाज के अलावा कुछ और
नजर ही नहीं आता था। उसी दरम्यान घरवालों ने सिर्फ तेरह साल की उम्र में ही उनकी
शादी उनके चचा की लड़की बशीरान बेगम से कर दी। इस शादी से उनके यहां एक
लड़का हुआ जिसका नाम मुहम्मद सईद रखा गया। ये शादी ज्यादा अर्से तक नहीं चल
सकी और कुछ ही सालों बाद तलाक हो गया।

ये बात घर में सभी जानते थे कि अब्बा की एक शादी पहले भी हो चुकी है और
उस शादी से उनका एक बेटा भी है, लेकिन घर में, और न ही किसी और के सामने
गलती से भी इस बात का जिक्र करने की किसी को इजाजत नहीं थी। अम्मा इस बात
को बिल्कुल ही बर्दाश्त नहीं करती थीं। जहां तक मुमकिन होता बाहरवालों से भी इस
बात को छुपाया जाता था। यहां तक कि अगर कभी कोई इस बात का जिक्र कर भी
देता तो अम्मा और जहीर मामू दोनों ही इस को गलत बताकर वहीं बात को खत्म कर
देते। इस बात को इतना क्यों छुपाया जाता था, ये मेरी समझ से बाहर था।

सईद भाई जान की उम्र चार-पांच साल रही होगी जब उन्हें मुंबई बुला लिया गया।
उसके बाद उनकी परवरिश मुंबई में ही हुई। अब्बा और अम्मा ने उन्हें लंदन
भेज दिया, और फिर वो वहीं बस गए।

अब मुहम्मद रफी के गाने जब रेडियो पर बजते तो उनकी बिरादरी के लोग भी
शौक से सुनते और उन पर बड़ा फख़ करते थे। संगीत निर्देशक श्याम सुंदर ने भी
उनका गाना कई बार लाहौर रेडियो पर सुना था। उन्होंने ही पहली बार अपनी पंजाबी
फिल्‍म गुल बलोच में अब्बा को गाने का मौका दिया। इस फिल्म में अब्बा ने पार्श्रगायक

के रूप में अपना पहला गाना गाया, जिसे 28 फरवरी को लाहौर में रिकॉर्ड किया
गया। इस गाने के बोल थे, सोणिये नी ह्ीरिये नी तेरी याद ने सताया …। उनके इस गाने
को बहुत पसंद किया गया और ये बहुत मशहूर हुआ। इसके बाद तो उनकी गायकी के
चर्चे हर तरफ होने लगे। उसी दौर में उस जमाने के मशहूर प्रोड्यूसर-एक्टर नासिर खां
ने भी रफी को सुना। उन्होंने भी रफी को बेहद पसंद किया और उन्हें अपने साथ मुंबई
चलने को कहा।

मुहम्मद रफी ने तो मुंबई जाने का इरादा कर लिया था, लेकिन उन्हें वहां जाने की
इजाजत बड़ी ही मुश्किलों के बाद मिल सकी। मुहम्मद दीन के एक दोस्त थे हमीद,
जिन्हें सब हमीद भाई कहकर बुलाते थे। ये उम्र में अब्बा से काफी बड़े थे। वो भी
मुहम्मद रफी के हुनर और सलाहियतों को देखकर उनमें दिलचस्पी लेने लगे थे। अब
सवाल ये था कि भोले-भाले, शर्मीले और कम बोलने वाले रफी को मुंबई अकेले कैसे
भेजा जाए। खैर फिर ये भी तय हो गया। इस सफर पर जाने के लिए उन्हें हमीद भाई
का साथ मिल गया। उफ! ये बात गौर करने की है कि पुराने लोग अपने उसूलों के
कितने पक्के होते थे। दिल पर भले ही कुछ भी बीत रही हो, दिल से दुआएं कुछ भी
निकल रही हों, लेकिन मजाल है जो किसी के सामने अपने उसूलों के खिलाफ कुछ भी
बोल दें। कुछ ऐसा ही रफी के वालिद साहब के साथ भी था। उन्होंने अपने दिल पर
पत्थर रख रफी को लाहौर स्टेशन पर अलविदा तो ज़रूर कहा लेकिन साथ में ये भी
कह दिया कि अगर तुम कामयाब न हो सको तो फिर कभी लौटकर वापस मत आना।
मैं भूल जाऊंगा कि मेरी कोई रफी नाम की औलाद थी।

यहां से मुहम्मद रफी साहब की जिंदगी के दूसरे दौर की शुरुआत हुई। 1942 में
बेहतर काम की तलाश में और बड़ी उम्मीदों के साथ वो मुंबई आ गए। उस जमाने में
मुहम्मद रफी साहब के सामने कुंदनलाल सहगल, पंकज मलिक, खान मस्ताना और
जी एम दुर्रनी जैसे बड़े गायक मौजूद थे। और फिर इन सबके बीच रफी अकेले भी
नहीं थे। उनके साथ इस दौड़ में मुकेश जी, तलत महमूद साहब और मत्रा डे जी जैसे
गायक भी शामिल थे। फिर बाद में किशोर कुमार साहब भी शामिल हो गए। हालांकि
रफी साहब इस मैदान में पूरी तैयारी के साथ उतरे थे क्योंकि उन्हें तो एक क्लासिकल
गायक की हैसियत से तैयार किया गया था। फिल्मों में गाने का तो उन्होंने कभी सोचा
भी नहीं था। उन्हें अपने उस्तादों से जो गायकी की तालीम मिली थी, उसकी नींव
दरबारी, मालकौंस और पहाड़ी जैसे रागों पर आधारित थी। इसके अलावा उन्हें ठुमरी,
गजल और वेस्टर्न म्युजिक पर भी पूरा-पूरा काबू था। लेकिन इसके बावजूद भी मंजिल
तक पहुंचना इतना आसान नहीं था। क्योंकि उस जमाने में हिंदी फिल्‍म संगीत पर
कुंदनलाल सहगल के गाने का अंदाज ऐसा छाया हुआ था कि हर गायक उन्हीं के जैसा

____________________________________________________

गाना चाहता था। यहां तक कि उस दौर का हर संगीत निर्देशक भी नए गायकों से यही
चाहता था कि वो सहगल साहब के ही अंदाज में गाएं। सहगल साहब के कद्रदान उन्हें
इस हद तक पसंद करते थे कि किसी दूसरे अंदाज में गाना सुनना ही नहीं चाहते थे।
फिर बेचारे नए गायक करते भी तो क्या?

मुझे अपने बचपन की एक बात बहुत अच्छे से याद है। उस जमाने में रेडियो
सीलोन पर सुबह आठ से नौ बजे तक पुराने गानों का प्रोग्राम आया करता था जिसमें
ज्यादातर गाने सहगल और पंकज मलिक के हुआ करते थे। उनमें ज्यादातर जब दिल
ही टरट गया हम जी के क्या करेंगे.. (शाहजहां, 1946, गायक के एल सहगल), बाबुल
मोरा नैहर छूटी ही जाए… (देवदास, 1935 गायक के एल सहगल), दुनिया रंग रंगीली
बाबा… (धरती माता, 1938, गायक के एल सहगल और उमा शशि), करूं क्या आस
निरास भर्ड… (दुश्मन, 1939, गायक के एल सहगल), और चले पवन की चाल..
(डॉक्टर, 1944, पंकज मलिक), या इन्हीं जैसे उस दौर के दूसरे मकबूल गाने बजाए
जाते थे। खैर, मुझे तो कभी उस दौर के गाने बहुत पसंद नहीं थे। मुझे तो वो ज्यादातर
आवाजें और उनके स्टाइल एक जैसे ही लगते थे। इसी से जुड़ी बचपन की एक और
बात मैं आपको बताती हूं। मेरे बड़े मामू हलीम खां गाने के बेहद शौकीन थे, और खुद
भी अच्छा गाते थे। कुंदनलाल सहगल के भी बहुत बड़े कद्रदान थे। जब मुहम्मद रफी
साहब का दौर शुरू हुआ तब वो उनके बहुत बड़े कद्रदान हो गए। यहां तक कि वो
कहते थे कि रफी साहब से अच्छा गाने वाला इस दुनिया में और कोई हो ही नहीं
सकता। लेकिन हैरत की बात तो ये थी कि रफी साहब के गाने भी वो सहगल के ही
अंदाज में गाते थे। उस दौर से वो कभी बाहर निकल ही नहीं सके। उनके गाने के
स्टाइल को सुनकर हम सब बच्चे हंस-हंसकर लोटपोट हो जाते थे। वैसे ऐसा करने वाले
वो अकेले नहीं थे, उनके जैसे बहुत से लोग थे।

बहरहाल, मैं बता रही थी कि एक तरफ तो रफी साहब को अपने घरवालों से
बिछड़ने का गम था तो दूसरी तरफ मुंबई आने की खुशी भी थी। इस अनजान शहर में
रफी साहब और हमीद भाई को सबसे पहले अपने लिए रहने का कोई ठिकाना ढूंढ़ना
था, और वो भी कम से कम पैसों में, कि न जाने इस फिल्म नगरी मुंबई में काम मिलने
में कितना अर्सा लग जाए। खैर, साहब! बकौल अब्बा के कि किस्मत ने मेरा हर जगह
साथ दिया। जल्दी ही उन्हें मुहम्मद अली रोड पर प्रिंसेस बिल्डिंग में रहने का ठिकाना
मिल गया। इसी बिल्डिंग में टॉप फ्लोर पर सिराजुद्दीन अहमद बारी साहब का खानदान

भी रहता था। उसी फ्लोर पर उनके पड़ोस में ही मुहम्मद रफी और हमीद भाई को
किराए पर रहने के लिए कमरा मिल गया।

ये अब्बा के लिए स्ट्रगल का दौर था। काम की तलाश में एक स्टूडियो से दूसरे
स्टूडियो तक पैदल भटकना। कभी कोरस में गाने का मौका मिल जाता, तो कभी वो भी
नहीं। कभी रिकॉर्डिंग कैंसल हो जाती तो रात को स्टेशन की बेंच पर ही सो जाते। कई
बार सिर्फ चने खाकर और पानी पीकर ही गुजारा करना पड़ता।

महीनों इसी तरह गुजर गए। इस बीच संगीत निर्देशक श्याम सुंदर भी मुंबई आ
चुके थे। उन्होंने मुहम्मद रफी साहब को गाने का दूसरा मौका अपनी फिल्‍म गांव की
गोरी में दिया। ये गाना था अजी दिल हो काबु में तो दिलदार की ऐसी तैसी.. ये रफी
साहब का पहला हिंदी गाना था। जो उन्होंने गायक जी एम दुर्यनी और साथियों के साथ
गाया था।

प्रिंसेस बिल्डिंग में रहते हुए कुछ और वक्त गुजरा, और इस बीच हमीद भाई ने
सिराजुद्दीन के बड़े बेटे मुनीर और उनके बाकी घरवालों के साथ अच्छा-खासा मेलजोल
बढ़ा लिया। बातों ही बातों में मुहम्मद रफी साहब के लिए एक जरिया बन गया।
सिराजुद्दीन साहब की पहली बीवी की बेटी कमर की शादी लखनऊ में अहमद हसन
साहब से हुई थी। संगीत निर्देशक नौशाद अली साहब के वालिद वाहिद अली साहब
लखनऊ में अहमद हसन के पड़ोसी थे, और दोनों की आपस में काफी अच्छी दोस्ती
थी। बस फिर क्या था, बात बन गई। वाहिद अली साहब ने अपने बेटे नौशाद अली के
नाम सिफारिश का खत लिख दिया। उन्होंने खत में लिखा था, मुहम्मद रफी अच्छा गाते
हैं, तुम इन्हें अपने साथ गाने का चांस ज़रूर देना। उन दिनों नौशाद साहब मुंबई में
संगीत निर्देशक की हैसियत से अपना मुकाम बना चुके थे। रफी साहब और हमीद भाई
खत लेकर नौशाद साहब से मिलने कारदार स्टूडियो पहुंचे। वालिद ने सिफारिश की थी,
इसलिए उन्होंने रफी साहब से कुछ सुनाने को कहा। रफी साहब ने एक गजल गाकर
सुना दी। नौशाद साहब ने कहा आपकी आवाज भी अच्छी है और आपके पास गायकी
का फन भी है, मैं आपको ज़रूर चांस दूंगा। नौशाद साहब ने मुहम्मद रफी को एक
कोरस में गाने का मौका दिया। ये फिल्म थी पहले आप और गाने के बोल थे, हिंदुस्तान
के हम हैं हिंदुस्तान हसारा.. |

धीरे-धीरे अब्बा की पहचान एक प्लेबैक सिंगर के रूप में बनने लगी। अलग-
अलग संगीत निर्देशकों के साथ उन्हें गाने का मौका भी मिलने लगा था, लेकिन उनके

लिए इतना काफी नहीं था। उन्हें तो उस लम्हे का इंतजार था जिसका अरमान लिए वो
अपने घर से निकले थे। खैर, इंसान चाहता तो बहुत कुछ है लेकिन जो बात जब होना
होती है, तभी होती है। जिस बात के बारे में अब्बा को सोचने तक की फुर्सत नहीं थी,
वो खुशी उनकी जिंदगी में बस अचानक ही आ गई। 1944 में, जब अब्बा की उम्र बीस
साल थी, तब उनकी शादी सिराजुद्दीन अहमद साहब और तालीमुन्रिसा की बड़ी बेटी
बिलकीस के साथ हो गई। जहां तक मुझे याद है सिराजुद्दीन साहब की चार बीवियां
और कुल मिलाकर नौ बच्चे थे। एक के बाद एक तीन बीवियों के गुजर जाने के बाद
तालीमुन्चिसा उनकी चौथी बीवी थीं जिनसे उन्हें दो लड़कियां और तीन लड़के थे। अम्मा
की उम्र उस वक्त सिर्फ तेरह साल थी। वो बताती थीं कि मुझे तो इस बारे में कुछ भी
पता नहीं था। एक दिन जब मैं स्कूल से वापस आई तो मुझसे कहा गया कि आज
तुम्हारी शादी है। मैं तो तुम्हारे अब्बा को “रफी भाई” कहकर बुलाती थी।

हमीद भाई अब्बा की देखभाल करने के साथ-साथ उनका पूरा काम भी संभाला
करते थे। उन्होंने भी सिराजुद्दीन साहब की पहली बीवी की बेटी मेहरुन्निसा से शादी कर
ली। रफी साहब और हमीद भाई रिश्ते में हमजुल्फ (साढू) बन गए। सन 950 तक वो
अब्बा के बेहद करीब रहे, लेकिन उसके बाद इन दोनों का साथ छूट गया। बाद में हमीद
भाई अपने बीवी-बच्चों के साथ जाकर बंगलौर में बस गए। उनके जाने के बाद अब्बा
के कामकाज की सारी जिम्मेदारी जहीर बारी ने अपने हाथों में ले ली।

अभी अब्बा को मुंबई आए तीन-चार साल ही हुए थे कि उन्हें के एल सहगल के
साथ गाने का मौका मिल गया। इसका उन्हें हमेशा से अरमान था। ये फिल्‍म थी
शाहजहां और इसका संगीत नौशाद साहब ने दिया था। गाने के बोल थे, सेरे यपनों की
रानी रूही रूही …। सहगल तो तेरह साल की उम्र में ही रफी की गायकी को सराह चुके
थे, इस मौके पर एक बार फिर उन्होंने बेहद तारीफ की। इस फिल्म के इसी गाने में
अब्बा ने एक बहुत छोटा सा रोल भी किया था। पांच-छह साल के शुरुआती स्ट्रगल के
जमाने में एक दिक्कत ये भी पेश आई कि अब्बा ने कामयाब गायक सहगल और उस
दौर के दूसरे बड़े गायकों के नक्शे-कदम पर चलने की जरा भी कोशिश नहीं की। उस
दौर में वो पहले गायक थे जिन्होंने शुरू से ही अपनी गायकी का एक अलग ही अंदाज
कायम किया। जब रफी साहब फिल्म इंडस्ट्री में आए थे, तब तक फिल्‍मी गाने एक ही
सप्तक के गाए जाते थे। लेकिन रफी साहब ने डेढ़ सप्तक के गाने गाकर हिंदी फिल्म
संगीत को एक नया रूप दिया।

फिल्‍म जुगनू बन रही थी। इसमें नूरजहां और दिलीप कुमार साहब काम कर रहे
थे। इस फिल्म का संगीत फीरोज निजामी साहब दे रहे थे। अब्बा इनके भी शागिर्द रह
चुके थे और इनकी कुछ फिल्मों में गा भी चुके थे। फीरोज निजामी भी उस्ताद अब्दुल
वहीद खां साहब के शागिर्द रह चुके थे। हिंदुस्तान के बड़े संगीतकारों में उनका नाम
लिया जाता था। जब वो दिल्‍ली में ऑल इंडिया रेडियो में संगीत विभाग के इंचार्ज थे,
उन दिनों रफी साहब ने कुछ महीने उनके साथ दिल्‍ली में रहकर क्लासिकल संगीत की
तालीम भी ली थी। इसके बावजूद भी फीरोज निजामी इस युगल गीत में नूरजहां के
साथ उन्हें गवाने में कुछ झिझक रहे थे।

नूरजहां एक अच्छी अदाकारा होने के साथ-साथ बेहतरीन गायिका भी थीं।
उन्होंने फीरोज निजामी से इस गाने के लिए अब्बा की सिफारिश की, और इतना ही
नहीं, बल्कि ये भी कहा कि अगर मुझे इस गाने के लिए रफी के साथ कई बार रिहर्सल
भी करनी पड़े, तो मैं उसके लिए तैयार हूं। उस वक्त अब्बा को खुद को एक अच्छा
गायक साबित करने के लिए ऐसे ही किसी मौके की सख्त ज़रूरत थी। अब्बा ने इस
बात के लिए हमेशा नूरजहां का अहसान माना और उन्हें अक्सर इस बात के लिए याद
किया। उन्होंने एक बार अब्बा से कहा था, “एक बात का हमेशा ख्याल रखना कि गाना
गाते वक्त कभी भी अपना मुंह न बिगाड़ना।” बिल्कुल सही फरमाया था। अगर गायक
को आवाज निकालने में आड़े-टेढ़े मुंह बनाने पड़े, तो वो गायक किस बात का?

________________________________________________________

मेरे ख्याल से ये किस्सा अस्सी के दशक का है। नूरजहां इंग्लैंड में एक टी वी शो
पर आई हुई थीं। मैं भी उस वक्त वो प्रोग्राम देख रही थी। जब उनसे अब्बा के बारे में
सवाल किया गया तो उन्होंने पंजाबी जबान में कुछ कहा। अल्फाज कुछ इस तरह थे,
“रफी ने तो जब से इंडिया में गाना शुरू किया “फट्रियां तोड़ दीं।”” मुझे समझ में नहीं
आया। लिहाजा मैंने फौरन बात का मतलब पूछा। मालूम पड़ा कि “फट्रियां’ तो
लकड़ियों को कहते हैं। ये जुमला इस्तेमाल किया जाता है जब कोई किसी काम में
कमाल कर दिखाए। जैसे अगर इस बात को इंदौरी जबान में कहा जाता तो कहते,
“ऊरे भैया, रफी साहब ने तो “छिलपें (लकड़ी से) निकाल दिए।””

जुगनू की रिलीज से पहले ही अब्बा और नूरजहां की आवाजों में गाया हुआ गाना
यहां बदला वफा का बेवफाई के सिवा क्या है … बहुत मशहूर हो गया था। इस वक्त
तक अऊब्बा ने फिल्मों में जितने भी गाने गाए थे, ये उनमें सबसे ज्यादा मशहूर हुआ था।
इसी फिल्‍म के एक और गाने में एक लाइन गाते हुए अब्बा ने दिलीप साहब के साथ
एक्टिंग भी की है। बोल थे, वो अपनी याद दिलाने को इक इश्क की दुनिया छोड़ गए

1947 अब्बा की जिंदगी में खुशियों की सौगात लेकर आया। फिल्‍म जुगनू रिलीज
हुई, तो हर एक की जबां पर यहां बदला वफा का … गाना था। इस गाने से अब्बा को
बहुत शोहरत मिली और उनके रास्से आसान होते चले गए।

जुगनू आखरी फिल्‍म थी जिसमें अब्बा पर्दे पर नजर आए। इससे पहले उन्होंने
लैला सजनूं और समाज को बदल डालो में भी छोटा सा रोल किया था। हालांकि अब्बा
का न तो कभी फिल्मों में एक्टिंग करने का इरादा था और न ही उन्हें इसका शौक था।
बस वक्त की ज़रूरत थी।

इस गाने को लेकर मैंने एक बार अब्बा से जिक्र किया था कि मेरी अम्मी जब भी
गाने के मूड में आती हैं तो हमेशा यहां बदला वफा का बेवफाई के सिवा क्या है … ही
सुनाती हैं। “अच्छा, बाजी गाती भी हैं?” “नहीं, अब्बा, बस ऐसे ही शौक में कभी-
कभी।” फिर जब बात का सिलसिला आगे बढ़ा तो अब्बा ने बताया, “मुझे इस गाने की
कामयाबी पर बहुत खुशी हुई थी। अपना तो शुरू से बस एक ही शौक था अच्छा खाना
खाने का। हमने बाजार से जाकर सामान खरीदा, और फिर हमीद भाई ने फर्स्ट क्लास
पंजाबी स्टाइल का खाना बनाकर खिलाया।”

इसी साल अब्बा-अम्मा की जिंदगी में एक खुशी और आई। अल्लाह ने उन्हें
उनकी पहली बेटी दी जिसका नाम परवीन रखा गया।

फिल्म नीलकमल (1968) का गाना बाबुल की दुआएं लेती जा … परवीन की
शादी के दिनों में ही रिकॉर्ड किया गया था। ये रफी खानदान की पहली शादी थी। गाने
के बोल बेटी की विदाई पर थे। गाते वक्त अब्बा को अपनी बेटी की विदाई का ख्याल
आ गया और वो बहुत जज्बाती हो गए। इसीलिए इस गाने के एक-एक लफ्ज में दर्द
भरा है। आज भी इस गाने को सुनने पर आखें डबडबा जाती हैं। उस वक्त जब अब्बा ने
इस बात का जिक्र घर में किया तो कहते हुए उनकी आवाज भर्रा गई थी और आंसू
बहने लगे थे। सन 1968 में इसी गाने के लिए अब्बा को पहली बार राष्ट्रीय पुरस्कार से
नवाजा गया था। इसके बाद अब्बा को दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार 1977 में फिल्‍म हम
किसी से कम नहीं के गाने कया हुआ तेरा वादा… के लिए हासिल हुआ।

रफी साहब की मादरी जबान पंजाबी थी। उर्दू में बात करने में भी पंजाबी लहजा
सुनाई देता था। अब्बा हमेशा अपने बच्चों से उर्दू में ही बातचीत करते थे। इसकी खास
वजह ये थी कि अम्मा न तो पंजाबी बोलना जानती थीं और न समझती ही थीं। अब्बा
के पास एक बहुत बड़ा हुनर ये था कि वो हर जबान में बहुत आसानी से गा लेते थे। वो
जिस जबान में भी गाना गाते, उन्हें सुनकर ऐसा लगता जैसे वह उनकी अपनी ही
जबान हो। उन्होंने अपने उन्तालीस साल के कैरियर में बहुत सी जबानों में गाया, जिनमें
उर्दू, हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, पंजाबी, गुजराती, सिंधी, तमिल, बंगाली, भोजपुरी, पश्तो,
फारसी, अरबी और कई और जबानें शामिल थीं। दुनिया के शायद ही किसी और
गायक ने इतनी जबानों में गाया हो।

एक तरफ अब्बा को खुशियां मिल रही थीं तो दूसरी तरफ उन्हें अपने
खानदानवालों से बिछड़ जाने का बहुत गम भी था। सन 1947 में जब हिंदुस्तान का
बंटवारा हुआ, तो अब्बा ने अपनी खुशी से हिंदुस्तान ही में रहने का फैसला किया।
अब्बा को प्लेबैक सिंगर की शक्ल में पूरी तरह कामयाबी मिली भी नहीं थी कि एक
और खुशी ने उनके दरवाजे पर दस्तक दी। 5 अगस्त को दिल्‍ली के लाल किले पर
आजादी का जश्न मनाया जा रहा था। इस मौके पर कई बड़े गायकों को वहां बुलाया
गया था। अब्बा भी उनके साथ दिल्‍ली पहुंच गए। इस कार्यक्रम में हिंदुस्तान के पहले
प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भी मौजूद थे। अब्बा की दिली तमन्ना थी कि उन्हें
भी वहां गाने का मौका मिल सके। उन्होंने कोशिश की और उन्हें सिर्फ तीन मिनट गाने
का मौका मिल गया। अब्बा की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था, गाने का मौका
मिला और वो भी पंडित नेहरू के सामने। उन्होंने लहराओ तिरंगा लहराओ … गाना
शुरू किया, तो लोगों ने उन्हें इतना पसंद किया कि खामोश बैठकर सुनते ही रहे।
पब्लिक तीन मिनट के बाद भी उनसे गाने की फरमाइश करती रही और वो बीस-
पच्चीस मिनट तक गाते रहे। पंडित नेहरू ने भी उस दिन उनका गाना इतना पसंद
किया कि खुश होकर उन्हें गले से लगा लिया। इसके बाद एक ऐसा वाकेया हुआ
जिसके बारे में अब्बा ने कभी सोचा भी नहीं था। पंडित नेहरू ने उनका गाना सुनने के
लिए उन्हें अपने घर बुलाया। ये वाकेया अब्बा की सुनहरी यादों का बेहतरीन हिस्सा था
जिसे उन्होंने हमेशा बड़े फख़ के साथ याद रखा।

और बस यहीं से अब्बा के सुनहरे सफर का आगाज हो गया। उनकी शोहरत और
मकबूलियत बढती ही गई। अब उन्हें दूसरे म्यूजिक डायरेक्टर भी गाने का मौका देने
लगे थे। हालात बेहतर होने लगे। सबसे पहले अब्बा ने अपनी मेहनत की कमाई से

अपना शौक पूरा किया; उन्होंने अपने लिए पहली गाड़ी “ऑस्टिन” खरीदी। और उसी

______________________________________________________

1948 वो साल था जिसके बाद अब्बा ने कभी पलटकर नहीं देखा। इस साल
उनके तीन गाने इस कदर लोकप्रिय हुए कि फिर अब्बा की शोहरत आसमान की
बुलंदियों को छूने लगी। इनमें से एक गाना गैर-फिल्‍मी था जिसे उन्होंने महात्मा गांधी
की शहादत के बाद गाया था। गाने के बोल थे, सुनो सुनो ऐ दुनिया वालो, बापू की ये
अमर कहानी, (गीतकार राजेंद्र कृष्ण, संगीत हुस्नलाल-भगतराम)। दूसरा था फिल्म
शहीद का गाना वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हों… (सहगायक खान मस्ताना,
संगीत गुलाम हैदर, गीतकार राजा मेहदी अली खां)। इस गाने को तो हद से ज्यादा
मकबूलियत मिली। साथ ही फिल्‍म मेला के गाने ये जिंदगी के मेले…* (संगीत नौशाद,
गीतकार शकील बदायूंनी) ने भी बेहद धूम मचाई। आखिरकार छह साल की कड़ी
मेहनत रंग लाने लगी थी और अब्बा अपना सही मुकाम हासिल करने लगे थे। उनके
गाए गाने सारे हिंदुस्तान और पाकिस्तान में हरेक की जबान पर थे।

और फिर 949 के बाद तो आलम ही कुछ और था। उनके बेहतरीन गानों की
गिनती बढ़ती ही चली गई। उन्होंने अपने सारे साथी गायकों को पीछे छोड़ दिया और
अपनी मंजिल की तरफ तेजी से बढ़ने लगे। गायकी को उन्होंने अपनी जिंदगी मान
लिया था और फिर उसे बड़ी संजीदगी से निभाया। अब्बा अक्सर कहते थे, “चांस
मिलना एक बात है, और चांस मिलने के बाद अपने मुकाम को बनाए रखना अलग बात
है।”

उनके इस जुमले पर आपको एक वाकेया सुनाती हूं। है तो ये बड़ी छोटी सी बात,
लेकिन इससे ये साबित होता है कि अब्बा को अपने काम के बारे में किस कदर
जिम्मेदारी का अहसास था। खालिद मेरा वजन कम करवाने के चक्कर में मुझे कुछ न
कुछ लालच देते रहते थे। वैसे मैंने कई बार कोशिश भी की, लेकिन नतीजा वही ढाक
के तीन पात। फिर मैंने मुंबई में बाकायदा योग शुरू कर दिया। वजन का मसला अब्बा
के साथ भी था, बेचारे तंग आकर अक्सर कहते, “यार, ये वजन क्यों कम नहीं होता,
जितना भी कम खाओ कोई फर्क ही नहीं पड़ता है।” हमारे कहने से अब्बा ने भी योग
करना शुरू कर दिया। रोज सुबह उन्हें सिखाने के लिए घर पर योग टीचर आने लगे।
मुश्किल से एक हफ्ता हुआ होगा, अब्बा को रियाज करते वक्त महसूस हुआ कि उनके
गले पर कुछ असर पड़ रहा है। हालांकि अब्बा ने कभी किसी भी चीज से परहेज नहीं
रखा। यहां तक कि ठंडी लस्सी, आइसक्रीम, खट्टा-मीठा सब कुछ खाते थे लेकिन
उन्होंने शराब, पान, सिगरेट, तंबाकू वगैरा को कभी हाथ नहीं लगाया। उन्होंने हमें

बताया और कहने लगे, “कहीं कुछ गड़बड़ ज़रूर है। मुझे पहली बार सुर लगाने में
दिक्कत आई है। मैं इतना बड़ा रिस्क नहीं ले सकता। रिकॉर्डिंग में फर्क पड़ जाएगा।”
और फिर मेरी तरफ देखकर कहने लगे, “क्या डॉली! योग तुम्हें ही मुबारक हो। जरा
अपनी अम्मा को भी साथ में करवाओ। इन्हें कौन सा गाना गाना है!”

अम्मा की दुनिया अब्बा से बिल्कुल ही अलग थी। खासकर शुरू में, एक तरफ
अब्बा सुबह से रात तक रिकॉर्डिंग में मसरूफ रहते, तो दूसरी तरफ अम्मा घर, बच्चों
और बावर्चीखाने में। अम्मा का गीत-संगीत से दूर-टूर तक कोई वास्ता नहीं था। अगर
उन्हें कुछ गाने याद भी थे, तो वो भी बच्चों की पैदाइश वगैरा के साथ जुड़े हुए थे। कभी
उन गानों को सुनतीं, तो फौरन बताने लगतीं। वरना यूं भी अक्सर जिक्र कर दिया
करतीं। मसलन, “बचपन में हमारा सईद आओ दूर के मुसाफिर हमको भी साथ लेले
(1955, उड़न खटोला ) बहुत गाता था।” या “खालिद जब पेट में था तो सुहानी रात
ढल चुकी, ना जाने तुम कब आगे (1949, दुलारी ) बड़ा मशहूर हुआ था।”

और इनकी पैदाइश पर कौन सा गाना था, आपको याद है?” मैंने पूछा। “हां, हां,
याद है, याद क्यों नहीं होगा? अच्छा ही गाना था। अल्लाह नेकी दे, (ये जुमला अम्मा का
तकिया-कलाम था) हां, याद आ गया, हम इश्क में बर्बाद हैं बबदि रहेंगे दिल रोएगा तेरे
लिए आंसू न बहेंगे लेकिन अम्मा गाने के बोल कभी गाकर नहीं
सुनाती थीं। “फिर नसरीन की पैदाइश के वक्त तक तो बेशुमार गाने हो चुके थे। कितने
याद रखती? बस फिल्म ही याद रह जाती थी, वो भी बड़ी बात थी। उसकी पैदाइश के
वक्त आन (1952) और बैजू बावरा (1952) के गाने तो ऐसे मशहूर हुए कि घर-घर
महीनों तक इन्हीं फिल्मों के गानों की गूंज थी। लोग तो इन गानों के लिए दीवाने थे।”

1954 में हामिद की पैदाइश के बाद अब्बा बांद्रा में किराए का मकान लेकर रहने
लगे। ये जगह प्रोफेसर अलमेड़ा पार्क के सामने थी। इस बिल्डिंग का नाम “मरीता” था।

अब्बा के वालिद अली मुहम्मद अपने बेटे से मिलने कई बार मुंबई आए। वो अपने
बेटे की कामयाबी पर बेहद खुश थे। उन्होंने अपनी जिंदगी में वो खुशी देख ली थी
जिसकी उन्होंने कभी उम्मीद भी नहीं की थी। एक सौ चार बरस की उम्र में उनका
लाहौर में इंतकाल हो गया। अब्बा आखरी बार अपने वालिद के चालीसवें पर
लाहौर गए थे। उनके साथ खालिद भी गए थे। उस वक्त खालिद की उम्र सिर्फ ग्यारह
साल थी। अब्बा उन्हें लेकर -मिअनी साहिब” के कब्रिस्तान में अपने वालिद और
वालिदा की कब्रों पर फातिहा पढने गए थे। इसके अलावा उन्होंने खालिद को अपने
बचपन का मकान घुमाकर कहा था, “देखो, ये तुम्हारे अब्बा का घर होता था।”

वक्त-वक्त पर अब्बा को कई अवार्ड और पुरस्कारों से भी नवाजा गया। 1962 में
अब्बा ने खुद ही हर साल मिलने वाले सर्वश्रेष्ठ पार्श्र गायक के अवार्ड को अब उन्हें न
देने की गुजारिश की। इसके बावजूद भी उन्हें कुछ और सर्वश्रेष्ठ गायक के अवार्ड दिए
गए। कुल मिलाकर उन्हें छह फिल्मफेयर अवार्ड मिले। जिन गानों के लिए ये अवार्ड
उन्हें मिले, वो थे: चौदहवीं का चांद हो… (चौदहवीं का चांद 1960), तेरी प्यारी- प्यारी
सूरत को… (ससुराल 1966), चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे. (दोस्ती, 1964), बहारो फुल
बरसाओ.. (सुरज 1966), गैं गाऊं तुम सो जाओ… (ब्रह्मचारी 1968), और क्या हुआ
तेरा वादा… (हम किसी से कस नहीं 1977)। इसके अलावा 1967 में भूतपूर्व राष्ट्रपति
डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी के हाथों उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया।
बेशुमार गीतों की कामयाबी और लोकप्रियता के बावजूद मैं ये समझती हूं कि मुहम्मद
रफी साहब इससे कहीं ज्यादा बड़े सम्मान के हकदार थे और आज भी हैं।

अम्मा को इस बात का गहरा दुख था कि अब्बा के इंतकाल के कई साल बाद तक
भी प्रशासन ने उनकी याद में कुछ भी नहीं किया। बहरहाल, बहुत तकाजों और
प्रशंसकों की कोशिशों के नतीजे में 9 अगस्त 1986 को बांद्रा में एक जगह को “रफी
चौक’ नाम दिया गया। इस मौके पर फिल्म इंडस्ट्री से आने वाले लोगों में संजय खां
साहब, सुनील दत्त जी, राजेंद्र कुमार साहब, मुकरी साहब और मुराद साहब वगैरा
शामिल थे।

लेकिन खुद अब्बा के लिए पुरस्कारों-सम्मानों की बनिस्बत लोगों से मिलने वाली
मुहब्बत अहम थी। अब्बा की आवाज लोगों के लिए क्या मायने रखती थी, इसकी
मिसाल इस वाकए से पता चल सकती है। सन 1963 में स्काला थिएटर, लंदन में हुए
एक प्रोग्राम के बाद अब्बा के एक फैन जो देख नहीं सकते थे, अब्बा के पास आए और
कहने लगे, “इस दुनिया में मुझे आखों की ज़रूरत नहीं है, जब तक कि मेरे कान
आपकी आवाज सुनने के लिए सलामत हैं।” ये दिल की गहराइयों से निकली हुई एक
बहुत बड़ी बात थी।

अब्बा एक सीधे-सच्चे इंसान थे जिन्हें अल्लाह ने बेपनाह हुनर से नवाजा था
जिसकी उन्होंने पूरी कदर की और उससे अपने प्रशंसकों को खुशी देने के लिए भरपूर
कोशिश की। यही वजह थी कि उनकी आवाज सीधे दिलों में उतरती थी।

________________________________________________

तानसेन

सन्‌ 1970 में आए म्यूजिक डायरेक्टर रवींद्र जैन रफी साहब को हमेशा तानसेन ही
बुलाते थे। इनकी पहली फिल्म राधेश्याम में भी रफी साहब ने गाया था। इसकी बहुत
माकूल वजह भी थी। फिल्म बैजू बावरा में एक दृश्य था जिसमें अभिनेता मनमोहन
कृष्ण कहते हैं, “बैजू ऐसा दिल लगा के संगीत का रियाज कर रहा है कि एक दिन
तानसेन से टक्कर लेगा।” और वास्तव में, शास्त्रीय संगीत और मेलोडी के आधार पर
तैयार हुई रफी साहब की गायकी का जिस तरह नौशाद साहब ने बैजू बावरा में
इस्तेमाल किया, वो बेमिसाल है। बैजू बावरा के गीत गाकर रफी साहब ने इस बात को
साबित कर दिया कि वो कोई मामूली गायक नहीं हैं। इस फिल्म के क्लासिकल गाने
कौन भूल सकता है। मन तरपत हारि दर्शन को आज … (1952), नौशाद, शकील

बदायूंनी), तू गंगा की सौज यैं जमुना का धारा …. निर्धन का घर लुटने वालो … इंसान
बनी कर लो भलाई का कोई काम …, आओ दुनिया के रखवाले … इस फिल्म में बैजू की
भूमिका भारत भूषण ने निभाई है, और उन पर फिल्माए गए सारे गाने रफी साहब ने
गाए हैं। ये गाने आज भी बहुत पसंद किए जाते हैं। पूरी दुनिया में संगीत प्रेमी इन्हें शौक
से बार-बार सुनते हैं।

नौशाद साहब किसी जौहरी से कम नहीं थे। उन्हें वाकई सच्चे हीरे की पहचान
थी। एक कोरस से नौशाद साहब और अब्बा का साथ शुरू हुआ था और ये साथ
तकरीबन ढाई दशक तक कायम रहा।

1949 में दो फिल्में आईं, जिनके तीन गाने बेहद मकबूल हुए। नौशाद साहब का
संगीत था, और गीतकार शकील बदायूंनी थे। इनमें से दो गाने फिल्म दिल्लगी के थे:
इस दुनिया में दिल का लगाना … और तेरे कुचे में अरयानों की दुनिया लेके आया हूं …
दूसरी फिल्म थी दुलारी जिसका गाना था सुहानी रात ढल चुकी ना जाने तुम कब
आओओगे …। ये गीत कामयाबी की सारी बुलंदियां पार कर गया। इस गाने में नौशाद
साहब ने रफी साहब की रेंज का पूरा-पूरा इस्तेमाल किया। तो रफी साहब ने भी गायकी

के जलवे बिखेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एक मखमली अंदाज में * सुह्ानी रात ढल
चुकी …* शुरू किया, और जब “हवा भी रूख बदल चुकी * गाया तो आज भी
सुनकर ऐसा लगता है जैसे दुनिया की सारी मायूसी उस *ई…* में सिमट गई हो। फिर
आवाज को बुलंदी पर ले जाकर शिकवे का इजहार सितारे अपनी रौशनी दिखा-दिखा
के सो गए… सबको हैरत में डाल देता है। क्या रफी साहब के अलावा कोई और इन
गानों को गा सकता था? इन खूबसूरत गीतों को पर्दे पर गानेवाले कलाकारों को लोग
भले ही भूल चुके हों, लेकिन ये गाने आज भी उतने ही पसंद किए जाते हैं जितने कि
उस जमाने में किए जाते थे। हालांकि नौशाद साहब ने अपने शुरू के गीतों के लिए
तलत महमूद की आवाज का इस्तेमाल किया था। कुछ गीत मुकेश साहब से भी गवाए-
खासकर अंदाज और मेला के, लेकिन फिर धीरे-धीरे उनका और रफी साहब का साथ
बढ़ता चला गया।

नौशाद, शकील और रफी-इनकी तिकड़ी बन चुकी थी और इन तीनों ने मिलकर
कामयाबी के झंडे गाड़ दिए। सोने पर सुहागा, बाद में इनके साथ एक नाम और जुड़
गया, अभिनय के सम्राट और मेरे मनपसंद हीरो दिलीप साहब का। जुगनू के मशहूर
युगल गीत यहां बदला वफा का … और शहीद के युगल गीत वतन की राह में … के
लिए रफी साहब पहले ही अपनी आवाज दिलीप कुमार को दे चुके थे। फिर भी दिलीप
साहब के लिए शुरू के कुछ गाने तलत महमूद (देवदास), मुकेश (अंदाज) और शब्बीर
हुसैन (आजाद) ने गाए थे।

इस दौरान रफी साहब श्याम सुंदर, फीरोज निजामी, गुलाम हैदर और नौशाद
साहब के अलावा उस दौर के कई कामयाब संगीतकारों के साथ भी गाते रहे जिनमें सी
रामचंद्र, हुस्नलाल-भगतराम, एस एन त्रिपाठी, हंसराज बहल, वसंत देसाई वगैरा
शामिल थे। हुस्नलाल-भगतराम के संगीत में खासतौर से दो गाने बेहद पॉपुलर हुए: इक
दिल के टुकड़े हजार हुए … (प्यार की जीत, गीत कमर जलालाबादी, 1948) और
मुहब्बत के धोखे में कोई न आए… (बड़ी बहन, गीत राजेंद्र कृष्ण, ।949)।

नौशाद साहब ने तय कर लिया था कि उनके संगीत की आवाज मुहम्मद रफी
होंगे। 95] की मशहूर फिल्म दीदार का संगीत नौशाद साहब दे रहे थे। उन्होंने पहली
बार इस फिल्म के सारे गाने रफी साहब से गवाए, और पर्दे पर इन गीतों को दिलीप
साहब ने गाया। लाजवाब गाने थे: मेरी कहानी भरुलने वाले तेरा जहां आबाद रहे…
नसीब दर पे तेरे आजमाने आया हूं… बचपन के दिन भुला न देना…, असीरे-पंजा- ए-
अहदे-शबाब करके मुझे… हुए हम जिनके लिए बबदि… । दीदार से दिलीप साहब ने
भी रफी साहब को अपनी आवाज मान लिया। बाद में उनकी तकरीबन सभी फिल्मों में
रफी साहब ने उन्हें अपनी आवाज दी, जिनमें आन उड़न खटोला, असर कोहीनूर

मुगले-आजस गंगा: जयना,; लीडर सघंद आदमी राम और श्याम और दिल दिया दर्द
लिया जैसी कामयाब फिल्में शामिल हैं।

दिलीप साहब के लिए रफी साहब ने इतने लंबे अर्से तक और इतनी फिल्मों में
गाया कि उनके लिए किसी और गायक की आवाज का तसव्वुर करना भी मुश्किल होने
लगा। रफी साहब की जिंदगी में तो शायद सिर्फ “70 के दशक की दो फिल्मों गोपी
(1973) और बैराग (1976) में दिलीप साहब के लिए कुछ गाने महेंद्र कपूर ने और
1974 की फिल्म सगीना में किशोर कुमार ने गाए।

नौशाद साहब ने 958 की फिल्म सोहनी सहिवाल में महेंद्र कपूर को पहली बार
अपने साथ गाने का मौका दिया। हुस्न चला है इश्क से मिलने, रात गजब की आई…
अब्बा बहुत खुश हुए कि नौशाद साहब ने महेंद्र कपूर को अपने साथ गाने का मौका
दिया और उन्होंने महेंद्र कपूर को अच्छा गाने पर मुबारकबाद दी। नौशाद साहब फिर
अपनी फिल्मों में रफी साहब से ही गवाते रहे। इसके बाद नौशाद साहब ने 968 की
फिल्‍म साथी के सभी गीत मुकेश जी से गवाए। और फिर उसी दौर की फिल्‍मों आदमी
और संघर्ष के गाने रफी साहब से गवाए।

_________________________________________________

सारी इंडस्ट्री में एक ही संगीतकार ओ.पी. नैयर ऐसे थे जिनका रफी साहब के
साथ बड़ा याराना था। दोनों ही लाहौर से थे और दोनों एक-दूसरे के साथ का बड़ा
आनंद लेते थे। यहां तक कि दोनों आपस में तू-तड़ाक से भी बातचीत करते थे। ओ.पी.
नैयर की पहली फिल्‍म बाज (1953) का पहला गीत घटा में छुपकर भी बिजली झलक
दिखला ही जाती है जो दिल की बात होती है नजर तक आ ही जाती है.. रफी साहब
ने ही गाया था। 1956 की फिल्म सीआईडी के गानों आंखों ही आंखों में इशारा हो
गया… ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां.. (गायक रफी, गीता दत्त, गीतकार मजरूह
सुल्तानपुरी) ने तो धूम ही मचा दी थी। इस फिल्म की कामयाबी के बाद रफी और
ओ.पी. नैयर ने कई जबरदस्त फिल्में साथ में कीं जिनमें तुम॒सा नहीं देखा नया दौर
एक मुसाफिर एक हसीना; फागुन मेरे सनम फिर वही दिल लाया हूं बसंत वगैरा
शामिल थीं। ओ.पी. नैयर ने तकरीबन सभी गीतों में पुरुष स्वर के लिए रफी साहब का
और महिला स्वर के लिए शुरू में गीता दत्त और बाद में आशा भोंसले की आवाज का
इस्तेमाल किया। बड़े अचरज की बात है कि उन्होंने अपने संगीत में लता मंगेशकर की
आवाज कभी नहीं ली। साठ के दशक के आखिर तक ओ.पी. नैयर के संगीत में रफी
साहब के गीत बेहद पॉपुलर हुए, जिनमें 1966 की फिल्म मुहब्बत जिदंगी है के गीत

तुम्हारी मुलाकात से मुझको पता ये चला…, न जाने क्यों हमारे दिल को तुमने दिल नहीं
समझा… और ये पुरनूर चेहरा ये दिलकश अदा नसूना हो कुदरत की कारीगरी का…
(गीतकार एस एच बिहारी), और 968 की फिल्म हमसाया का गीत दिल की आवाज
भी सुन मेरे फसाने पे न जा… (गीतकार शेवन रिजवी) बहुत पसंद किए गए। इस दौर
के बाद ओ.पी. नैयर के संगीत की लोकप्रियता पहले के मुकाबले कुछ कम होने लगी
थी। इसी दशक में कई नए संगीतकार फिल्म जगत में कदम जमा चुके थे जिनमें
सोनिक-ओमी भी शामिल थे जिन्होंने अपने संगीत कैरियर की शुरुआत रफी साहब के
साथ ही की। इनकी पहली फिल्म दिल ने फिर याद किया के गीत रफी साहब ने ही गाए
थे। उस वक्त के दूसरे संगीतकारों में कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल,
आर.डी. बर्मन, और इन सबके बीच जमे रहे शंकर-जयकिशन वगैरा थे।

ओ.पी. नैयर और रफी साहब 1979 तक लगातार साथ काम करते रहे। ओ.पी.
नैयर का मानना था कि रफी साहब के अलावा किसी और के लिए उनके संगीत के
अंदाज का साथ देना मुश्किल होगा। सत्ताइस साल के इस साथ के दौरान ओ.पी. नैयर
ने बहुत कम ही गीत दूसरे गायकों से गवाए, जैसे 1968 की फिल्म किस्मत में महेंद्र
कपूर से और 1969 की फिल्म संबंध में मुकेश और महेंद्र कपूर दोनों से। इसके
अलावा, 1972 की फिल्म एक बार मुस्कुरा दो में उन्होंने किशोर कुमार की आवाज ली।
इस फिल्म में रफी साहब का भी गाना था। लेकिन इस बदलाव के पीछे कोई खास
वजह नहीं थी, यानी किसी किस्म की नाराजगी या झगड़ा वगैरा नहीं था। ऐसा सिर्फ
वक्ती तौर पर हुआ था। सत्तर के दशक में ओ.पी. नैयर की सात फिल्में आई ऐसा भी
होता है (1977), एक बार मुस्कुरा दो (1972), टैक्सी ड्राइवर (1973), प्राण जाए पर
वचन न जाए (1973), खून का बदला खून (1978), बिन मां के बच्चे (1979), और
हीरा सोती (1979)-और इन सभी फिल्मों के गाने रफी साहब ने ही गाए।

अब्बा के दौर में आए ज्यादातर संगीतकारों का पहला गाना अब्बा ने ही गाया,
जिनमें “40 के दशक में आए एस.डी. बर्मन की पहली फिल्म दो थाई (1947), का
गाना दुनिया में मेरी आज अंधेरा ही अंधेरा भगवान कहां है मेरी किस्मत का सवेरा…
रोशन की पहली फिल्म नेकी और बदी (1948) और फिर 949 की फिल्‍म बरसात थीं,
जिसका संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया था।

बरसात आर के बैनर की फिल्म थी जिसमें राज कपूर खुद भी काम कर रहे थे।
इस फिल्म में पहली बार उन्होंने शंकर-जयकिशन को संगीतकार जोड़ी की हैसियत से
संगीत देने का मौका दिया था। राज साहब शुरू से ही अपने लिए मुकेश जी की
आवाज लेते थे। राज कपूर, मुकेश, शंकर-जयकिशन और गीतकार हसरत जयपुरी/
शैलेंद्र की आपस में अच्छी जुगलबंदी सी बन गई थी। शंकर-जयकिशन बरसात का

एक गाना मैं जिदंगी में हरदस रोता ही रहा हूं.. अब्बा की आवाज में गवाना चाहते थे।
रिहर्सल के वक्त जब अब्बा से उनकी मुलाकात हुई, तो वो कुछ घबराए हुए से थे।
शंकर-जयकिशन ने अब्बा को बताया, “हम ये बात जानते हैं, और हमें सबने यही कहा
भी है कि इस गाने में उतार-चढ़ाव बहुत हैं, इसे रफी साहब के अलावा और कोई नहीं
गा सकेगा। हम आपको धुन सुना देते हैं।” उन्होंने अब्बा को धुन सुनाई और कहने लगे,
“आपने धुन सुन ली है, अब आप जैसा चाहें, इसे गा दें। हम ये आप पर छोड़ते हैं।”
अब्बा की शुरू से ही आदत रही कि वो नए गायक-गायिकाओं, और संगीतकारों की हर
मुमकिन मदद करते थे। उन्होंने शंकर-जयकिशन की हिम्मत बंधाई और कहा, “मुझे
आप पर पूरा भरोसा है, आप संगीतकार हैं, जैसा आप मुझे बताएंगे मैं वैसा ही
गाऊंगा।” शंकर-जयकिशन के संगीत निर्देशन में रफी साहब का ये पहला गाना बेहद
मकबूल हुआ। इस गाने से शुरू हुआ इनका साथ तीन दशक तक हिंदी सिनेमा जगत में
धूम मचाता रहा। राज साहब के लिए शंकर-जयकिशन भले ही मुकेश जी की आवाज
का इस्तेमाल करते थे, लेकिन बाकी फिल्मों और नायकों के लिए उन्होंने हमेशा ही रफी
साहब को लिया। बरसात के इस गाने के अलावा 1963 की फिल्‍म एक दिल और सौ
अफसाने में शंकर-जयकिशन ने राजकपूर के लिए भी रफी साहब की ही आवाज ली।
कई रोमांटिक गानों में से एक बेहतरीन गाना जिसे रफी साहब और लता मंगेशकर जी
ने गाया था तुम ही तुम हो मेरे जीवन में फुल ही फुल है जैसे चमन में.. । खालिद को ये
गाना बेहद पसंद था, और अक्सर मूड में आते तो मुझे सुनाने भी लगते। मैं उन्हें छेड़ती,
“जरा गाने में अब्बा की तरह रोमांटिक फीलिंग तो पैदा कीजिए।” तो अपने खास
मजाकिया अंदाज में कहते, “वो तो नामुमकिन है, कोई भी नहीं ला सकता। चलो मैं
तुम्हें रिकॉर्ड ही सुना देता हूं।”

हालांकि राज कपूर के गाने सिर्फ मुकेश गाते थे, फिर भी दूसरे कई संगीतकारों ने
अपनी धुनें रफी साहब की आवाज में राज कपूर के लिए गवाई, जिनमें तेरा काम है
जलना परवाने चाहे शसा जले या ना जले.. (फिल्म पापी , संगीत एस मोहिंदर,
(1953), इरी रा राक्का आाका का बाकका बाका का टांका वरली का नाका… (फिल्म दो
उस्ताद, संगीत ओ.पी. नैयर, (1959), दुनिया में नहीं कोई यार वफादार जसाना कहता
है.. (फिल्म अंबर , संगीत गुलाम मुहम्मद, (1952) वगैरा शामिल हैं।

बदलते वक्त के साथ सिने संगीत में भी तब्दीलियां हो रही थीं। शंकर-जयकिशन
के दौर में 1961 से संगीत में एक बड़ा बदलाव आया। इन्होंने साजों का ज्यादा
इस्तेमाल शुरू किया। ज्यादा ऑर्किस्ट्राइजेशन के साथ इनकी फड़कती और तूफानी
धुनों पर रफी साहब की गायकी का एक बिल्कुल ही अलग अंदाज सामने आया। ये
गीत आज भी बजते हैं तो दिल पर छा जाते हैं। ये आंखें उफ यू मा; ये सुरत उफ यू

मा… जिया आओ जिया ओ जिया कुछ बोल दो… सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था…
(जब प्यार किसी से होता है), और याह्ठ चाहे कोई मुझे जंगली कहे… (जंगली), तेरी
प्यारी: प्यारी सुरत को किसी की नजर ना लगे (ससुराल), नजर बचाकर चले गए वो…
(दिल तेरा दीवाना), ए गुलबदन ए गुलबदन फलों की महक कांटों की चुधन..
(प्रोफेसर)। इसके अलावा शंकर-जयकिशन की कई और फिल्मों के बेहतरीन गीत भी
रफी साहब ने गाए, जिनमें हमराहीः दिल एक मंदिर: असली-नकलीः एप्रिल फल:
आरजु’ लव इन टोकियो’ लाट साहब बदतसीज जानवर सूरज; झुक गया आसमान;
ब्रह्मचारी वगैरा शामिल हैं।

ये दौर था देव आनंद, राजेंद्र कुमार, शम्मी कपूर, जॉय मुखर्जी, विश्वजीत, महमूद
और जॉनी वॉकर का। इन कलाकारों पर फिल्‍्माए गए गाने बहुत लोकप्रिय हुए। लोग
बार-बार इन गानों को सुनना चाहते थे। इन गानों की मकबूलियत इस कदर बढ़ी कि
]962 से 967 तक के दौर में कई बार “शंकर-जयकिशन नाइट” की गई, जिनमें रफी
साहब ने भी छह-सात बार हिस्सा लिया।

________________________________________________________

एक बहुत बड़ी खूबी रफी साहब की ये थी कि शोहरत और लोकप्रियता की ऐसी
बुलंदियों पर पहुंचने के बाद भी जहां न उनसे पहले कोई पहुंचा और न ही जहां तक
शायद कोई कभी पहुंच सके, वो कभी भी किसी संगीतकार के काम में दखलअंदाजी
नहीं करते थे। खामोशी से संगीतकार की धुन को सुनते, और अपनी राय सिर्फ तभी
देते जब उन्हें लगता कि ऐसा करने से गाने में कुछ बेहतरी हो सकती है। ये बात फिल्म
प्रोफेसर के युगल गीत मैं चली मैं चली पीछे- पीछे जहां.. की रिहर्सल के वक्त की है।
इस गाने में रफी साहब की लाइन सजदे में हसन के झुक गया आसमान… की
ओरिजनल धुन कुछ और थी, अब्बा ने शंकर-जयकिशन को राय दी, “अगर मैं अपनी
लाइन को नीचे सुर से लेकर उठाऊं तो कैसा रहेगा?” और जब उन्होंने गाकर सुनाया तो
शंकर-जयकिशन को बेहद पसंद आया, और उन्होंने फौरन कह दिया कि बस, यही धुन
रखेंगे। और फिर वो गीत उसी धुन पर बना। ये दोनों ही रफी साहब को बहुत मानते थे
और उनकी गायकी के बहुत बड़े कद्रदान थे। इस हद तक कि अगर कभी किसी धुन
को लेकर दोनों की राय एक नहीं होती तो वो फैसला रफी साहब पर छोड़ देते थे। फिर
जिस धुन को अब्बा ज्यादा पसंद करते वो उसी को फाइनल कर लेते थे।

शंकर-जयकिशन ने बड़ी खूबसूरती के साथ रफी साहब की रेंज, आवाज और
गायकी का पूरा-पूरा फायदा उठाया। साथ ही उन्होंने रफी साहब की खासियत,
शास्त्रीय संगीत, का भी भरपूर इस्तेमाल किया। इस तरह के गानों की बड़ी खूबसूरत
मिसालें हैं फिल्म बसंत बहार (1956) के गीत दुनिया न भाए मोहे अब तो बुला ले
चरणों में चरणों में… और बड़ी देर धरई बड़ी देर भर कब लोगे खबर सोरे राय… । इसके

अलावा 1964 की फिल्‍म बेटी-बेटे के यादगार गीतों में से उस हसीन गीत राधिके तूने
बंसरी चुराई बंसरी चुराई कया तेरे मन आई.. को कौन भूल सकता है?

1959 की फिल्‍म शरारत के संगीत निर्देशक भी शंकर-जयकिशन ही थे। इस
फिल्‍म के हीरो किशोर कुमार थे जो खुद भी एक बहुत अच्छे गायक थे, लेकिन फिर भी
शंकर-जयकिशन ने ये गाना अजब है दास्तां तेरी ऐ जिदंगी; कभी हँसा दिया रुला दिया
कभी… रफी साहब से गवाया, क्योंकि इस गाने में रेंज के साथ आवाज के उतार-चढ़ाव
भी बहुत थे।

रफी साहब सिर्फ एक बेहतरीन गायक ही नहीं थे, बल्कि उन्हें संगीत की
जानकारी भी उतनी ही अच्छी थी लेकिन उन्होंने अपने इस हुनर को अपनी हद तक ही
रखा। अब्बा खुद तबला और हारमोनियम बहुत अच्छा बजाते थे। जानकारी होते हुए
भी उन्होंने हिंदी फिल्मों में कभी संगीत नहीं दिया और न ही कभी देना चाहा। लेकिन
हां, कुछ गैर फिल्‍मी गीत ज़रूर ऐसे हैं जिन्हें उन्होंने अपनी आवाज देने के साथ ही
अपनी धुनों में भी ढाला।

मुहम्मद रफी, यानी हिंदी सिनेमा के हर नायक, सहनायक, चरित्र अभिनेता, हास्य
कलाकार की आवाज। वो जिस मूड का भी गीत गाते थे, उसी में खो जाते थे। यही
उनकी सबसे बड़ी खासियत थी। चाहे वो बैजू बावरा के भारत भूषण के लिए गा रहे हों,
चाहे कोहीनूर के दिलीप कुमार के लिए, मेरे सहबूब के राजेंद्र कुमार के लिए, शराबी के
देव आनंद के लिए, कागज के फ़रुल के गुरुदत्त के लिए, कश्मीर की कली के शम्मी कपूर
के लिए, या फिर जिद्दी के जॉँय मुखर्जी के लिए, या शहनारई , के विश्वजीत के लिए,
बेटी बेटे के सुनील दत्त के लिए, भीगी रात के प्रदीप कुमार के लिए, असानत के मनोज
कुमार के लिए, हीर रांझा के राजकुमार के लिए, यकीन के धर्मेंद्र के लिए, महद्ब की
मेंहदी के राजेश खन्ना के लिए, अशिसान के अमिताभ बच्चन के लिए, फर्ज के जितेंद्र
के लिए, आमने सामने के शशि कपूर के लिए, लैला मजनूं के ऋषि कपूर के लिए, या
फिर दोस्ती के सुधीर कुमार के लिए, वो अपनी आवाज और अंदाज में अदाकार के
अंदाज के साथ ऐसा तालमेल बिठाते थे कि बस सुनते और देखते ही बनता था।

एक आवाज और अनगिनत चेहरे। कुछ चेहरे ऐसे भी आए जिन्हें रफी साहब की
लाजवाब गायकी की बदौलत ही उनकी “इमेज” हासिल हुई। मिसाल के तौर पर, 957
की फिल्म तुम॒सा नहीं देखा के साथ शम्मी कपूर साहब की। ये फिल्म उनके कैरियर के
लिए एक अहम मोड़ साबित हुई। इस फिल्म का संगीत ओ.पी. नैयर साहब ने दिया
था। उन्होंने रफी साहब की आवाज का अपने अलग ही ढंग से इस्तेमाल किया। इस
फिल्म में रफी साहब के गानों की क्या बात थी! छुपने वाले सामने आ…. जवानियां ये
सस्त-सस्त बिन पिए… यूँ तो हसने लाख हसीं देखे हैं ठुस॒सा नहीं देखा… जैसे गानों

को शम्मी कपूर ने भी पर्दे पर बड़ी ही खूबसूरती से निभाया है। रफी साहब की गायकी
की एक-एक हरकत पर उनकी रग-रग फड़कती थी। उनके इसी अंदाज की वजह से
उन्हें “एल्विस प्रेस्‍्ली ऑफ इंडिया* कहा जाने लगा था। फर्क बस इतना था कि एल्विस
प्रेस्‍्ली खुद अपने गानों पर थिरकते थे, जबकि शम्मी कपूर रफी साहब के गानों पर।
तुमया नहीं देखा के बाद इन दोनों का एक से बढ़कर एक फिल्मों में साथ रहा। भले ही
म्यूजिक डायरेक्टर कोई भी रहा हो, लेकिन शम्मी कपूर ने तकरीबन हमेशा ही अपने
गानों के लिए रफी साहब को ही चुना। दिल दे के देखो! जंगली: प्रोफेसर वल्लाह क्या
बात है. तीसरी संजिल’ एन इवनिंग इन पेरिस; उजाला; चायना टाउन अंदाज: जमसीर
वगैरा उन अनगिनत हिट फिल्मों में हैं जिनमें इस जोड़ी ने साथ काम किया।

राज कपूर और शम्मी कपूर दोनों ही भाइयों को अपनी फिल्मों के संगीत से
हमेशा गहरी दिलचस्पी रही। राज कपूर खासतौर से अपनी फिल्मों के गीत-संगीत पर
बेहद तवज्जो देते थे। यही बात शम्मी कपूर में भी थी। उन्हें रफी साहब की गायकी और
अंदाज से खास लगाव रहा। वो सही मायने में रफी साहब की गायकी का भरपूर लुत्फ
लेते थे। बिल्कुल जैसे उसमें खो जाते थे। उनकी ज्यादातर कोशिश यही रहती थी कि
अपने गानों की रिहर्सल के वक्त वो स्टूडियो में मौजूद रहें। शम्मी कपूर अब्बा की एक-
एक हरकत को बड़ी बारीकी से देखते थे, और अक्सर अब्बा से कहते थे, “रफी भाई,
आप जैसा गाएंगे, मैं वैसी ही एक्टिंग करूंगा।” एक बार बातचीत के दौरान अब्बा ने
हमें बड़े मजे से ये किस्सा सुनाया, “फिल्म ब्रह्मचारी के गाने दिल के झरोखे में ठुझको
बिठाकर.. की रिहर्सल के दौरान शम्मी कपूर ने मुझसे कहा, “रफी भाई, आप इस
मुखड़े को बिना सांस लिए एक साथ गा दें, तो कैसा रहे?” मैं सुनकर हंसने लगा।
“अच्छा!” और मैंने उनके कहने के मुताबिक एक ही सांस में उन्हें वैसा ही गाकर सुना
दिया। शम्मी कपूर मुझे हैरत से देखते रह गए। फिर मैंने उनसे मजाक में कहा, “तुम
मुझसे गाना गवा रहे हो या मेरी सांस बंद कराना चाहते हो? बस बहुत हुआ। जिंदा
रहूंगा तो गाना गाऊंगा ना।” सुनकर वहां मौजूद सभी लोग हंसने लगे। रिकॉर्डिंग पर
शम्मी कपूर जब भी आ जाते हैं, खूब हंसी-मजाक और मस्ती का माहौल हो जाता है।”

रफी साहब की आवाज को दूसरे अभिनेताओं की बनिस्बत शम्मी कपूर के साथ
ज्यादा जोड़ा गया। ये कहना गलत न होगा कि ये दोनों जैसे दो जिस्म एक जान थे।
जिस रोज अब्बा का इंतकाल हुआ, शम्मी कपूर मुंबई से काफी दूर वृंदावन में थे।
वापस आते ही वो अफसोस के लिए सीधे रफी विला पहुंचे। सभी की तरह उन्हें भी
यकीन नहीं हो रहा था कि रफी साहब हम सबको इस तरह अचानक छोड़कर चले गए
हैं।

______________________________________________

शम्मी कपूर साहब इस बात को मानते थे कि जो कामयाबी उन्हें मिली है, उसमें
रफी साहब की आवाज का बहुत बड़ा हिस्सा है। 1998 की बात है जब फिल्म जानय
समझा करो की शुटिंग के लिए शम्मी कपूर लंदन में थे। मेरे मामूजाद भाई सलमान खां
ने मेरे बेटे राशिद को उनसे मिलवाया। “ये मुहम्मद रफी साहब के पोते हैं।” शम्मी कपूर
साहब राशिद से मिलकर बेहद खुश हुए। और उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखकर उसे
आशीर्वाद दिया। फिर थोड़ा रुककर कहा, “बेटे, तुम्हारे दादा जी बहुत ही बड़े गायक
थे। उनकी तारीफ में मैं क्या कहूं? बस इतना कहूंगा कि मेरी मकबूलियत में तुम्हारे दादा
का बहुत बड़ा हाथ है।” राशिद की उम्र उस वक्त सिर्फ सत्रह साल थी। उसे ये बात
सुनकर बहुत खुशी हुई और उसकी आंखों में आंसू आ गए, वो कुछ कहना चाहते हुए
भी कुछ नहीं कह सका। लेकिन उसे इस बात की बहुत खुशी थी कि इतना वक्त गुजर
जाने के बाद भी शम्मी कपूर साहब ने दादा अब्बा के लिए इतनी बड़ी बात कही।

इस बात में कोई शक नहीं है कि भारतीय सिनेमा के कलाकारों और संगीतकारों
के लिए मुहम्मद रफी साहब वरदान भी थे और चुनौती भी। फिल्‍मी गीतों और गजलों
के अलावा रफी साहब की गायकी का दायरा गैर फिल्‍मी गीतों और भजनों तक फैला
हुआ था। उन्होंने दिल को छू जाने वाली अनगिनत गजलें और भजन गाए। मीर तकी
‘मीर’ की दिल की बात कही नहीं जाती चुपके रहना ठाना है… दाग देहलवी की गजब
किया तेरे वादे ऐ ऐतबार किया… और मिर्जा गालिब की दिया ये दिल अगर उसको
बशर है क्या कहिए.. जैसी बेमिसाल और खूबसूरत गजलें, और ये यादगार भजन
सुनियो अरज हमारी प्रभुजी दुनिया की इस भरी सथा में… सोरे श्याम सोरे श्याम पल-
पल सोरे मुख से निकले..; श्याम से नेहा लगाए राधे नीर बहाए.. बेहद लोकप्रिय हैं।

रफी साहब ने संगीतकार श्याम सुंदर से लेकर रवींद्र जैन, अन्नू मलिक, बप्पी
लहरी और राजेश रोशन तक सभी संगीतकारों के साथ काम किया। पचास के दशक में
आए ओ.पी. नैयर, मदन मोहन, कल्याणजी-आनंदजी और उषा खन्ना की पहली
फिल्मों के गाने रफी साहब ने ही गाए। मदन मोहन की पहली फिल्म जांखें (950) का
पहला गीत हम इश्क में बर्बाद हैं बर्बाद रहेंगे.. बहुत मकबूल हुआ। रफी साहब की
मदन मोहन से अच्छी दोस्ती थी। दोनों ने साथ में कमाल के गाने बनाए, जिनमें कथी न
कभी कहीं न कहीं कोई न काई तो आएगा… (शराबी, 1964, राजेंद्र कृष्ण), मैं ये
सोचकर उसके दर से उठा था… (हकीकत, 1964, कैफी आजमी), ये दुनिया ये
महफिल मेरे काम की नहीं.. (हीर रांझा,1970, कैफी आजमी), तेरे दर पे आया हूं
कुछ करके जाऊंगा… और बबदि-मुहब्बत की दुआ साथ लिए जा.. (लैला मजनूं
1976, साहिर लुधियानवी) वगैरा खासतौर से काबिले-जिक्र हैं।

फिल्म जगत में रफी साहब का हाल “एक अनार और सौ बीमार” वाला था। हर
अभिनेता और हर संगीतकार अपने गीत रफी साहब की ही आवाज में गवाना चाहता
था। अब्बा बड़ी मुश्किल ही से किसी को ना करते थे। उनकी हमेशा यही कोशिश रहती
थी कि सबको खुश रख सकें। इसीलिए सारी फिल्म इंडस्ट्री उन्हें बड़े प्यार और इज्जत
की नजर से देखती थी। हमने कभी अब्बा की जबान से ये नहीं सुना कि उनका किसी
के साथ कोई झगड़ा है, या कि मैं इस संगीतकार के साथ काम नहीं करूंगा या फलां
कलाकार के लिए नहीं गाऊंगा। बेशक एक-दो बातें ऐसी ज़रूर हुईं कि वक्ती तौर पर
संगीत निर्देशक खय्याम साहब और कल्याणजी भाई अब्बा से नाराज हो गए थे लेकिन
अब्बा को उनसे कोई नाराजगी नहीं थी और न ही उन्होंने कभी इस बात को कोई मुद्दा
बनाया। खय्याम साहब बहुत अच्छे संगीतकार रहे, और उनके ताल्‍्लुकात भी अब्बा से
बहुत अच्छे रहे। उनके संगीत में रफी साहब ने कुछ बेहतरीन गीत गाए जैसे, जाने क्या
ढूंढ़ती रहती हैं ये आंखें मुझमें… और लता जी के साथ युगल गीत जीत ही लेंगे बाजी
हम तुम… ( शोला और शबनम ), और 1964 की फिल्‍म शगुन में तुम चली
जाजओगी परछाडइ़यां रह जाएंगी… वगैरा। साठ के दशक में दोनों ने साथ में एक रिकॉर्ड
भी बनाया जिसमें एक तरफ भजन थे और दूसरी तरफ गजलें।

साठ के दशक के मध्य तक खय्याम साहब के पास ज्यादा फिल्में नहीं थीं। उन्हीं
दिनों में वो रफी साहब के साथ “खय्याम नाइट” करना चाहते थे। अब्बा ने अपने तजुर्बे
के आधार पर उन्हें राय दी, “पहले आप अपना काम और नाम बढ़ा लो, फिर नाइट
करेंगे तो बेहतर होगा और फायदे में भी रहेंगे।” ये बात उन्हें बहुत बुरी लगी और वो
अब्बा से नाराज हो गए। कहने लगे, “आपने मुझे शंकर-जयकिशन, रवि और रोशन
वरगैरा के मुकाबले में कम समझा।” बाद में उन्होंने कहा कि रफी साहब को गुरूर आ
गया है, अब मैं महेंद्र कपूर को रफी बनाऊंगा। उसके बाद उन्होंने करीब सात-आठ
साल तक अब्बा के साथ काम नहीं किया। बाद में जब उन्हें फिल्में मिलने लगीं, तब भी
उन्होंने रफी साहब के साथ काम नहीं किया। इतने लंबे अर्से तक उनके नाराज रहने के
बावजूद भी अब्बा ने उनके साथ दोबारा खुशी-खुशी काम किया, जैसे कुछ हुआ ही न
हो। बाद में उनकी कुछ खूबसूरत धुनों को रफी साहब ने आवाज दी, जैसे फिल्म शंकर
हुसैन में कहीं एक मासूम नाजुक सी लड़की… (1977, गीतकार कमाल अमरोही), और
1979 की फिल्म चंबल की कसम (गीतकार साहिर लुधियानवी) में शेर का हसन हो
नगसे की जवानी हो ठुम.. और लता जी के साथ युगल गीत सिमटी हुई ये घड़ियां फिर
से न बिखर जाएं.. |

कल्याणजी-आनंदजी और रफी साहब का साथ करीब दो दशक रहा। इनकी
पहली फिल्म बेदर्द जसाना कया जाने का गीत लकड़ी जल कोयला भर्ड कोयला जल
भर्ड राख ये दुखिया ऐसी जली कोयला भर्ड ना राख.. (कल्याणजी वीरजी शाह,
1959, गीतकार भरत व्यास) रफी साहब ने ही गाया था। कल्याणजी-आनंदजी के लिए
रफी साहब ने बहुत सी फिल्मों में गाने गए, जिनमें खासतौर से यादगार गाने हैं, गोविंदा
आला रे आला, जरा सटकी संभाल बुजबाला… (ब्लफ मास्टर, 1963, गीतकार राजेंद्र
कृष्ण), हिमाला की बुलंदी से सुनी आवाज है आई.. (फूल बने अंगारे, 1963, आनंद
बख्शी), हमने देखा है तुम्हें ऐसा गु्मां होता है.. (जी चाहता है, 1964, हसरत जयपुरी),
औओ मेरे बेचैन दिल को चैन तूने दिया, शुक्रिया शुक्रिया… (आमने सामने, 1967, आनंद
बख्शी), चले थे साथ मिलकर चलेंगे साथ सिलकर.. (हसीना मान जाएगी, 1968,
अख्तर रोमानी) वगैरा।

यहां पर मैं रफी साहब के एक ऐसे गाने का जिक्र करूंगी जो उन्होंने कल्याणजी-
आनंदजी के संगीत निर्देशन में शशि कपूर के लिए गाया था। जिस खास अंदाज में
जंगली में शम्मी कपूर ने सायरा बानो के लिए अपने प्यार का इजहार याहू’ चाहे कोई
मुझे जंगली कहे.. गाकर किया था, ठीक उसी अंदाज में उफ्फ्रू खुदा खुदा खुदा वाह-
वाह इस दीवाने दिल ने कया जादू चलाया… (जब जब फूल खिले, 1965 हसरत
जयपुरी) जोशीले और मस्ताना अंदाज में गाते हुए शशि कपूर ने नंदा के लिए किया
था। इस गीत में भी रफी साहब ने कमाल किया है।

जिस जमाने में रफी साहब शंकर-जयकिशन नाइट कर रहे थे, कल्याणजी भाई ने
भी रफी साहब को अपने साथ नाइट करने के लिए कहा। अब्बा ने मसरूफियत की
वजह से उनसे माफी मांग ली। और उन्हें सुझाव दिया, “आप लता जी के साथ कर
लें।” “रफी साहब, आप हमारे गाने तो गाते हैं।” “लता जी भी तो आपके गाने गाती हैं।
फिर ऐसा है तो दोनों को बुलाइए।” इस बात पर वो अब्बा से चिढ़ गए और उनसे
कतराने लगे लेकिन कुछ ही अर्से के बाद उनकी नाराजगी खुद-बखुद खत्म हो गई।
और उन्होंने रफी साहब के साथ काम करना फिर से शुरू कर दिया।

उषा खन्ना की पहली म्यूजिकल हिट फिल्म दिल दे के देखो के सभी गीत रफी
साहब ने गाए थे। इस फिल्‍म में कुल मिलाकर दस गाने थे जिनमें से चार गीतों में रफी
साहब का साथ आशा भोंसले जी ने दिया था। 1959 की इस फिल्म में कमाल के गाने
थे और ये गाने आज तक पसंद किए जाते हैं। हम और तुम और ये समां क्या नशा नशा
सा है… राही मिल गए राहों में बातें हुर्ड निगाहों में… बोलो बोलो कुछ तो बोलो प्यार
है तो कह दो यस प्यार नहीं तो कह दो ना. फिर जो हो हो यो हो… वगैरा (गीतकार
मजरूह सुल्तानपुरी)। इसके अलावा भी कई फिल्मों में उषा खन्ना के संगीत निर्देशन में

_

_____________________________________________

अब्बा ने बड़े गजब के गाने गाए, मसलन दिल के आईने में तस्वीर तेरी रहती है..
(आओ प्यार करें, 1964, गीतकार राजेंद्र कृष्ण), या हबीबी या हबीबी मैंने रखा है
मुहब्बत अपने अफसाने का नाम… (शबनम, 1964, गीतकार जावेद अख्तर), हम
तुमसे जुदा होके सर जाएंगे रो-रोके… (एक सपेरा एक लुटेरा, 1965, गीतकार असद
भोपाली), बुंदें नहीं सितारे टपके हैं कहकशां से.. (साजन की सहेली, 1980, मजरूह
सुल्तानपुरी) वगैरा।

तेरे प्यार ने मुझे गम दिया; तेरे गम की उम्र दराज हो.. इस गजल को 1961 में
संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए रफी साहब ने गाया था। छैला बाबू
(गीतकार असद भोपाली) लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की पहली फिल्म थी। इस गजल को
गवाने के लिए लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने रफी साहब के पास आकर उनसे दर्खस्त की
कि आप हमारे लिए इस गजल को गा दीजिए। फिल्म निर्माता चाहते हैं कि इसे आप
गाएंगे तभी बात बनेगी, लेकिन उनकी जेब में आपको देने लायक पैसे नहीं हैं। ये
सुनकर अब्बा का दिल तो पिघलना ही था। उन्होंने फौरन हां कर दी। अब्बा ने ये गजल
इतना डूबकर गाई है कि सुनने वाले का भी इसमें बस डूब जाने का दिल करता है।
रिकॉर्डिंग के बाद फिल्म निर्माता ने बड़े झिझकते हुए गाने के सिर्फ एक हजार रुपए
दिए। अब्बा ने खामोशी से ले लिए। लेकिन फिर उसी वक्त उन्होंने वो रुपए लक्ष्मीकांत-
प्यारेलाल के हाथ में देकर कहा, “जाओ, तुम दोनों इसकी मिठाई खरीदकर खा लेना।
ये तुम्हारी अच्छी धुन का तोहफा है।” ये थे रफी साहब! अब्बा ने कई नए फिल्म
निर्माताओं और संगीतकारों की इसी तरह मदद की।

इस तरह रफी साहब के साथ लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के संगीत का सफर शुरू हुआ
और इन्होंने तकरीबन दो दशक तक साथ काम किया। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की 1963
में आई दूसरी फिल्म “पारसमणि” के गीत भी अब्बा ने ही गाए थे। सभी गाने बेहद
मकबूल हुए, खासतौर से रौशन तुग्हीं से दुनिया रौनक तुम्हीं जहां की… (गीतकार
इंदीवर) को बहुत पसंद किया गया।

फिल्म दोस्ती में तो रफी साहब के गानों ने कमाल ही कर दिया। आज भी लोग
इन गानों के लिए पागल हैं। राह्ी सनवा दुख की चिंता क्यों सताती है… मेरा तो जो भी
कदम है वो तेरी राह में है… और चाहूंगा मैं वुझे सांझ- सवेरे… (गीत मजरूह
सुल्तानपुरी, 1964)। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने जब चाहूंगा में ठुड्ो.. की धुन बनाई, तो
उन्हें तसल्‍ली नहीं हो रही थी। वो अपनी इसी उलझन को लेकर रफी साहब के पास आ
गए। उन्होंने अब्बा से कहा, “आपसे अच्छी सलाह हमें और कौन देगा? हम अपनी ये
धुन सुनाकर आपकी राय जानना चाहते हैं।” लेकिन जब उन्होंने अब्बा को धुन सुनाई
तो उन्हें बेहद पसंद आई। अब्बा को जब कोई धुन या गीत बहुत पसंद आता था, तो वो

बहुत खुश हो जाते थे। खुश होकर उन्होंने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से कहा, “मैं इस गाने
की कामयाबी की गारंटी लेता हूं। मैं गाऊंगा, आप लोग रिकॉर्डिंग की तैयारी करो।”
और वाकई अब्बा ने ठीक कहा था। इस गीत को जबरदस्त मकबूलियत हासिल हुई।
फिल्‍म दोस्ती को उस साल तीन फिल्मफेयर अवार्ड मिले: लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को
सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का, मजरूह सुल्तानपुरी को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का और रफी
साहब को चाहूंगा मैं ठुडी गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का।

अब्बा खुद को हमेशा ऐसी किसी भी बात से टूर रखते थे जिसमें उन्हें विवाद या
झगड़ा होने का जरा भी अंदेशा होता था। इस सिलसिले में एक वाकेया आपको सुनाती
हूं। हमारे घर में बड़ी खुशी का मौका था। मैं तो बहुत ही खुश थी। अब्बा को 1977 में
फिल्म हम किसी से कम नहीं के गीत क्या हुआ तेरा वादा… (संगीतकार राहुल देव
बर्मन, गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी) के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का फिल्मफेयर पुरस्कार
मिलने वाला था। इसी साल लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को भी असर अकबर एंथोनी के लिए
सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का अवार्ड मिलने वाला था। अब्बा ने समारोह से कुछ दिन
पहले तय किया कि वो समारोह में नहीं जाएंगे। हम सब सुनकर हैरान हो गए। उस
जमाने में फिल्मफेयर के कायदे के मुताबिक सर्वश्रेष्ठ गायक को वहीं फंक्शन में गाना
पड़ता था। अब्बा को ऐसा ख्याल हुआ कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल क्यों आर.डी. बर्मन
की धुन बजाना चाहेंगे, कहीं मेरे वहां पर जाने से कोई मुश्किल न खड़ी हो जाए। अगर
मैं नहीं जाऊंगा तो कोई मसला ही नहीं रहेगा। ये सोचकर अब्बा ने अपना जाना रद्द कर
दिया। जब लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को इस बात का पता चला, तो उन्हें बड़ा दुख हुआ कि
इतनी सी बात के लिए रफी साहब अवार्ड लेने नहीं जा रहे हैं। प्यारेलाल जी का फौरन
ही फोन आ गया। उन्होंने कहा, “रफी साहब, आप अवार्ड लेने ज़रूर जाएंगे। हम
अपना ऑर्केस्ट्रा आर.डी. बर्मन की धुन के लिए जमाएंगे।” उनकी बात सुनकर अब्बा
को तसल्‍ली हो गई और फिर वो फिल्मफेयर के फंक्शन में गए। उन्हें ओ.पी. नैयर के
हाथों सर्वश्रेष्ठ गायक का अवार्ड दिया गया। मेरा बड़ा अरमान था कि मैं भी अवार्ड
समारोह में जाऊं लेकिन मुझे वहां जाने की इजाजत नहीं मिली। मगर जब अब्बा घर
लौटे तो उनके चेहरे की खुशी देखकर मुझे सब कुछ मिल गया।

________________________________________________

नौशाद साहब और शंकर-जयकिशन की तरह लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने भी रफी
साहब की गायकी की हर खूबी से फायदा उठाया। सारे संगीतकारों में अब्बा से सबसे
ज्यादा गीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने ही गवाए थे। उनकी मौत पर लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल
ने कहा था, “रफी साहब हमारे सबसे प्रिय गायक थे, उनके जाने से हमारा संगीत
अनाथ हो गया।” इनके संगीत में अब्बा ने एक से बढ़कर एक गीत गाए। खासकर
सत्तर के दशक की फिल्मों में इनके गाने बेहद हिट हुए जिनमें से कुछ गाने हैं: पूछे जो

कोई मुझसे बहार कैसी होती है.. (आप आए बहार आई, , आनंद बख्शी), ये जो
चिलमन है दुश्मन है हमारी.. (महबूब की मेंहदी, , आनंद बख्शी), हसीन
दिलरुबा करीब आ जरा… (रूप तेरा मस्ताना, 1972, असद भोपाली), आज सौसस
बड़ा बेईमान है.. (लोफर, 1973, आनंद बख्शी), बंदा परवर मैं कहां ये आपकी
महफिल कहां… (पॉकेटमार, 1974, आनंद बख्शी), मैं जट यमला पगला दीवाना…
(प्रतिज्ञा, 1975, राजेंद्र कृष्ण), परदा है परदा परदे के पीछे परदानशीं है.. (अमर
अकबर एंथोनी, 1977, आनंद बख्शी), ओ मेरी महबूबा… (धर्मवीर, 1977, आनंद
बख्शी), हम तो चले परदेस हम परदेसी हो गए… (सरगम, 1979, आनंद बख्शी), मेरे
दोस्त किस्सा ये क्या हो गया… (दोस्साना, 1980, आनंद बख्शी), धक धक से धड़कना
भुला दे.. (आशा, 1980, आनंद बख्शी), जॉन जॉनी जनार्दन तरा रस पस पस पस
पस… (नसीब, 1980, आनंद बख्शी), अब ये जाना कि इसे कहते हैं आना दिल का…
(लेडीज टेलर, 1980, मजरूह सुल्तानपुरी), दर्दे दिल दर्दे जिगर दिल में जगाया
आपने.. (कर्ज, ।980, आनंद बख्शी)।

मुहम्मद रफी साहब एक मुकम्मल गायक थे। संगीतकार को उनमें हर वो खूबी
मिल जाती थी जो उसे किसी गायक से चाहिए होती थी, इसीलिए संगीतकार बेधड़क
होकर किसी भी रेंज और किसी भी लय पर धुन बना लेते थे, गाना चाहे किसी भी मूड
का हो। अब्बा बताते थे, “गाने की मांग क्या है, मैं उसी के हिसाब से सुरों को ढालता
हूं।” अब्बा वक्त के साथ चलते रहे। उन्होंने हर दौर के संगीत निर्देशक की मांग को पूरा
किया। लेकिन जहां तक खुद अब्बा की पसंद की बात थी, तो उन्हें वो गाने ज्यादा
अच्छे लगते थे जिनमें गायक की आवाज मुख्य हो और संगीत कम से कम। अब्बा
कहते थे, “मैं गायक हूं, कम संगीत हो तो मुझे अपनी आवाज के जौहर दिखाने का
मौका ज्यादा मिलता है। मुझे गाने में ऑर्केस्ट्रेशन का इस्तेमाल उतना ही पसंद है
जिससे गाने की खूबसूरती बनी रहे।” फिर भी बदलते वक्त के साथ टैक्नीक भी बदली,
सत्तर के दशक में संगीतकार राहुल देव बर्मन ने बहुत ज्यादा ऑर्किस्ट्रेशन का इस्तेमाल
किया, लेकिन इसके बावजूद जहां कई दूसरे गायकों की आवाजें ज्यादा ऑर्किस्ट्रा में
गुम हो जाती थीं, वहीं रफी साहब की आवाज पर ऑर्किस्ट्रा कभी भारी नहीं हुआ।

संगीतकार सचिन देव बर्मन रफी साहब को बेहद पसंद करते थे। रफी साहब ने
उनकी कई फिल्मों में बेहतरीन गाने गाए थे। 1957 की फिल्म प्यासा का गाना ये महलों
ये तख्तों ये ताजों की दुनिया… (गीतकार साहिर लुधियानवी) बहुत सराहा गया। 959
की फिल्म कागज के फल के गाने देखी जमाने की यारी, बिछड़े सभी बारी-बारी… की
रिहर्सल के दौरान फिल्‍म के निर्देशक और हीरो गुरुदत्त बार-बार इस गीत को सुनते और
अब्बा से कहते, “जरा और दर्द का अहसास पैदा कीजिए।” कैफी आजमी ने जितना

खूबसूरत ये गीत लिखा, उतनी ही खूबसूरती से रफी साहब ने इसे गाकर इसमें चार
चांद लगा दिए। इसके अलावा तेरे घर के सामने जिद्दी तेरी सूरत मेरी आंखें बंबई का
बाढु तीन देवियां बेनजीर गाइड और इश्क पर जोर नही जैसी फिल्मों में भी रफी
साहब और सचिन दा ने साथ काम किया। 1969 की फिल्‍म आराधना में भी एस.डी.
बर्मन ने रफी साहब से आनंद बख्शी के लिखे दो युगल गीत गवाए: गुनगुना रहे हैं भंवरे
खिल रही है कली कली… (आशा जी के साथ) और बागों सें बहार है कलियों पे निखार
है.. (लता जी के साथ)। इसी दौरान एस.डी बर्मन बीमार हो गए और फिल्म का बाकी
काम आर.डी. बर्मन ने संभाल लिया। फिल्‍म के दूसरे दो गीत राहुल देव बर्मन ने किशोर
कुमार से गवाए। अराधना हिट हुई और राजेश खन्ना ने किशोर कुमार को अपनी
आवाज बना लिया। वैसे राजेश खन्ना ने अपनी पहली फिल्म राज का गाना अकेले हैं
चले आओ जहां हो.. (संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी, गीतकार शमीम जयपुरी) रफी
साहब की आवाज में ही लिया था और ये गाना मकबूल भी बहुत हुआ था।

संगीतकार राहुल देव बर्मन ने भी अपनी संगीत यात्रा की शुरुआत रफी साहब के
साथ ही की थी। उनकी पहली फिल्म छोटे नवाब के सभी गीत रफी साहब ने ही गाए
थे। ।961 की इस फिल्‍म के लिए शैलेंद्र के लिखे आम छुम ताम छुम कलाला बदासम
छुम … और इलाही टू सुन ले हमारी दुआ … जैसे एकदम ही भिन्न मिजाज के गाने
गाकर रफी साहब ने अपने हरफन मौला हुनर का छोटा सा उदाहरण पेश कर दिया था।
पहला गीत उन्होंने अभिनेता महमूद के लिए बच्चे की तोतली आवाज में गाया था, तो
दूसरे गीत में उन्हीं के लिए गिड़गिड़ाकर मां-बाप की जिंदगी के लिए दुआ की। उन्होंने
आर.डी. बर्मन के साथ तीसरी मंजिल, बहारों के सपने प्यार का मौसम द ट्रेन कारवां
यादों की बारात हम किसी से कम नहीं अब्दुल्ला और शान जैसी फिल्मों में भी गाने
गाए। शान के एक गीत यम्सा यम्सा यस्मा यम्मा; ये खूबसूरत समां (गीतकार आनंद
बख्शी, 1980) में आर.डी. बर्मन ने भी रफी साहब के साथ गाया था। घर पर अब्बा ने
हमें बताया, “क्या खालिद, पंचम मेरे साथ गाना गाएगा। यार, उसका स्टाइल तो
बिल्कुल ही अलग है। मैं कैसे गा सकूंगा? ये अब्बा की आदत थी। अगर कोई संगीत
निर्देशक कुछ नया करने को कहता तो अब्बा कभी ये नहीं कहते थे कि वो कर लेंगे।
हालांकि उनके लिए कैसा भी गाना मुश्किल नहीं था। उन्होंने कभी डींगें नहीं हांकीं।
अब्बा ने इस गीत को आर.डी. बर्मन के साथ आवाज से आवाज मिलाकर जोरदार
गाया। रिकॉर्डिंग के बाद जब हमने घर पर गीत सुना, तो मैं हैरान थी। गाना सुनाकर
अब्बा भोलेपन से पूछते हैं, “कैसा लगा?”

रफी साहब ने अपने उन्तालीस साल के संगीत सफर में गायिका जीनत बेगम,
नूरजहां, अमीरबाई कर्नाटकी, जोहराबाई अंबालेवाली से लेकर सुरैया, गीता दत्त, लता

मंगेशकर, शमशाद बेगम, सुमन कल्याणपुर तक के साथ गीत गाए। नई पीढ़ी की
गायिकाओं में अनुराधा पौडवाल और सुलक्षणा पंडित वगैरा के साथ कई गीत गाए।
सभी गायिकाओं में सबसे ज्यादा गीत उन्होंने आशा भोंसले जी के साथ गाए।

रफी साहब को 1942 से 1980 तक फिल्म जगत के लगभग सभी संगीतकारों के
साथ गाने का मौका हासिल हुआ था जिनमें नौशाद, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल,
कल्याणजी-आनंदजी के अलावा रोशन, रवि, जयदेव, हेमंत कुमार, चित्रगुप्त, इकबाल
कुरैशी, दत्ता राम, हंसराज बहल और शारदा जैसे कई बड़े और दिग्गज संगीतकार
शामिल हैं। अब्बा का कहना था कि ये मेरी खुशकिस्मती है कि सभी संगीतकारों ने
मुझसे मेरी काबिलियत के हिसाब से बेहतरीन काम लिया। बड़े-छोटे हर संगीतकार को
अब्बा अपना गुरु मानते थे और उनकी बहुत इज्जत करते थे। रफी साहब को
संगीतकारों से जो कुछ भी मिला, उसे उन्होंने दोगुना करके उन्हें लौटा दिया।

फैन से फैमिली तक

मुझे इंदौर शहर में बचपन से जवानी तक का गुजारा अपना वक्त आज भी इसी तरह
याद है जैसे ये कल की बात हो। मेरा जन्म वहीं पर हुआ था। पुराने जमाने में जचगी के
लिए आमतौर पर बेटियां अपने मायके चली जाती थीं। मेरा ददिहाल मध्यप्रदेश के ही
भोपाल शहर में है। आठ साल की उम्र तक मेरी परवरिश भोपाल में हुई और पढ़ाई भी
वहां के सेंट जोजेफ कॉन्वेंट में हुई। उसके बाद हम लोग इंदौर आ गए। मेरी आगे की
पढ़ाई संयोगितागंज कन्या महाविद्यालय में हुई। ये स्कूल “जगदाले” के नाम से भी
जाना जाता है।

ओल्ड पलसिया के खान कंपाउंड में मैं बड़ी हुई। यहां मेरे नाना अब्दुल रशीद खां
साहब रहा करते थे। ये सारा कंपाउंड उनकी जायदाद था। उनके सब बच्चे यहीं पल-
बढ़े और फिर यहीं बस गए। हालांकि अब ये जगह बहुत बदल गई है लेकिन फिर भी
आज तक इसी नाम से जानी जाती है।

मेरे नाना अब्दुल रशीद खां साहब इंदौर में डीएसपी रहे थे, उसके बाद वो
मंडलेश्वर के डीआईजी हो गए। ब्रिटिश राज ने उनकी बहादुरी के लिए उन्हें “दिलेर
बहादुर” का खिताब भी दिया था। मेरे दादा मिर्जा आबिद हुसैन खां बहुत कामयाब
ठेकेदार थे। उनका काम भोपाल, रायसेन, खानडेरा के आसपास के इलाकों में फैला
हुआ था। उनके पास पठान मजदूरों की अच्छी-खासी फौज थी जिनका बसेरा खानडेरा
में था। इसीलिए इस जगह का नाम खानडेरा (अब खंडेरा) पड़ा। उन्होंने इस इलाके में
एक तरह से अपनी हुकूमत कायम कर रखी थी। इसके अलावा उनके नाम और काम
के चर्चे दूर-दूर तक फैले हुए थे। जंग के जमाने में उन्होंने असम जाकर बमबारी के
बीच, मुश्किल हालात में वहां का हवाईअड्डा बनवाया था। इससे खुश होकर अंग्रेजों ने
उन्हें “खान बहादुर का खिताब दिया था।

मेरे बाबा दिल्‍ली की जामिया मिल्लिया में पढ़ रहे थे। कुछ अर्से बाद उन्हें बढ़ते
कारोबार की जिम्मेदारियों को संभालने के लिए बुला लिया गया। यहां से बाबा का नया

सफर शुरू हुआ। जब इंदौर हवाईअड्डे का निर्माण शुरू हुआ तो इस काम की
जिम्मेदारी बाबा को दी गई। ये बहुत ही मुश्किल काम था। सारा इलाका पथरीले पहाड़ों
का था जिन्हें तोड़कर हवाईअड्डा बनाने में महीनों लग गए। इस दौरान वो इंदौर के खान
कंपाउंड में किराए पर रहे। यहीं पर बाबा-अम्मी की मुलाकात हुई, और इस कहानी की
शुरुआत हुई। उस दौर से शायद बाबा की इतनी यादें जुड़ी थीं कि जब भी इंदौर
हवाईअड्डे आना होता, तो वो उस दौर का कोई न कोई किस्सा सुनाने लगते थे। बाबा
को बहुत कमउम्र में ही इज्जत, दौलत, शोहरत, कामयाबी सभी कुछ मिल गया था।
ठेकेदारी के अलावा वो ट्रांसपोर्ट बिजनेस, खेती-बाड़ी, जमीन-जायदाद सब संभालते
थे। जीवनशैली ऐसी कि लोग देखते रह जाते। एक से एक गाड़ियां खरीदते। परिचितों
के बीच वो हमीद भाई, हमीद भैया, मिर्जा साहब, मिर्जा जी के नाम से मशहूर थे।

मेरे नाना अपनी बेटी के लिए पढ़ा-लिखा, नौकरीपेशा लड़का तलाश रहे थे। बाबा
की जीवनशैली से प्रभावित होने के बावजूद नाना थोड़े फिक्रमंद थे। उन्होंने रिश्ते को
तो मंजूरी दे दी लेकिन मेहर की रकम एक लाख रुपए रखने की मांग की। उन्होंने अम्मी
के लिए ये भी मंजूर कर लिया। इस तरह दोनों खानदानों में रिश्ता हो गया।

वक्त गुजरता रहा। इसी कामयाबी और बुलंदी के दौर में कुछ साल बाद बाबा ने
दूसरा निकाह कर लिया जो कुछ साल के अंदर खत्म भी हो गया। यही वजह थी कि
अम्मी हम पांचों भाई-बहनों को लेकर इंदौर वापस आ गई थीं।

___________________________________________

मुझे याद है जैसे ही हम लोग स्कूल से आते थे सीधे अपना बस्ता फेंकते, कुछ
खाते-पीते और कंपाउंड में खेलने भाग जाते। हमारे कंपाउंड में बच्चों की कमी नहीं
थी। और घर के बड़े लोग मैदान में मूढ़ों पर बैठकर बातचीत करते रहते। हमारे बचपन
के खेलों में रस्सी-कूद, बैडमिंटन, एक्सप्रेस, सत्तोलिया, खो-खो, डॉजबॉल, अंशटा-
चंगा-पे और कैरम वगैरा थे। खेल से हमारा कभी दिल ही नहीं भरता था। लेकिन अम्मी
का हुक्म था कि जैसे ही मगरिब की अजान सुनो, फौरन घर में आ जाओ।

मेरे बाबा बड़े दिलचस्प मेजबान थे, मेहमानदारी करना तो कोई उनसे सीखता।
उनका बस चलता तो वो अपने मेहमानों के लिए आसमान के तारे भी तोड़ लाते। अम्मी
कहतीं, “तुम्हारे बाबा तो बस बिछे चले जाते हैं।” इसके अलावा बाबा बड़े अच्छे कुक
भी थे। हमारे घर में अक्सर “वन-डिश पार्टी की जाती थी जिसमें वो खुद बिरयानी,
पाये, खिचड़ा, खड़े मसाले का गोश्त, उसके साथ रूमाली रोटी और दाल भापले
बनवाते थे। अम्मी बाबा के लिए चाहे कुछ भी कहती हों, लेकिन वो खुद भी कुछ कम

मेजबान नहीं थीं। वो भी अक्सर अपनी सहेलियों के साथ फिल्में देखने, पिकनिक पर
जाने, और बैडमिंटन और खो-खो के मैच खेलने वगैरा में लग जाती थीं। इसके अलावा
सब मिलकर बस से अपने फार्म पर जाते और जो भी मौसमी फल या सब्जियां होतीं,
जैसे गन्ना, हरे चने, मूंगफली, सीताफल, आम, मटर, जामुन वगैरा, सब उनका खूब
मजा लेते।

यूं तो बचपन की बहुत सी बातें ऐसी हैं जिन्हें आज भी मैं यादों के झरोखों से
झांक आती हूं लेकिन बारिश का मौसम आने पर बाबा के साथ मछली के शिकार पर
जाने को मैं बहुत ज्यादा मिस करती हूं। बाबा नदी किनारे बंसी में बलिया लगाकर पानी
में डोर डालकर चुपचाप बैठ जाते और मैं उनके पास ही बैठकर गैस स्टोव पर प्याज,
आलू और कनकव्वे के पत्तों के भजिये बनाकर खुद भी खाती जाती और उन्हें भी
खिलाती रहती। हम घंटों इसी तरह चुपचाप बैठे रहते और सिर्फ इशारों से आपस में
बात करते वर्ना मछली पकड़ में न आती। दरअसल मुझे इसी तरह धीरे-धीरे खाना
बनाने का भी शौक पैदा हो गया।

मेरे घर के सभी बड़े फिल्में देखने के बेहद शौकीन थे; इस हद तक कि वो कोई
भी फिल्‍म नहीं छोड़ते थे। लेकिन हम बच्चों को हर फिल्म नहीं दिखाई जाती थी। हमें
पातालपरी वीर दुर्गादास टारजन छूमंतर बारूद जमीन के तारे और जिंबो जैसी
सिर्फ बच्चों के देखने लायक फिल्में ही दिखाई जाती थीं। इस मामले में अम्मी बड़ी
सख्त थीं।

कभी-कभी हमारे स्कूल से आउटिंग के लिए फिल्‍म दिखाने भी ले जाते थे। एक
बार हमें फिल्म काबुलीवाला दिखाने ले जाया गया जो रीगल चौराहे पर
मिल्‍्कीवे टॉकीज में लगी थी। इस टॉकीज (जो अब ढहा दिया गया है) से मेरे बचपन
की कई यादें जुड़ी हुई हैं। वैसे तो उस जमाने में भी इंदौर में एक से बढ़कर एक टॉकीज
मौजूद थे जिनमें एलोरा, रीगल, यशवंत, अलका, श्रीकृष्ण, राज, बैंबीनो और स्टारलिट
वगैरा थे। अंग्रेजी फिल्में सिर्फ स्टारलिट और बैंबीनो में ही लगती थीं। इन सबके
मुकाबले में मिल्‍्कीवे बड़ा मामूली सा टॉकीज था, लेकिन ये बड़ा साफ-सुथरा रखा
जाता था। चारों तरफ टिन की चादरें, उनके अंदर की तरफ काले पर्दे पड़े हुए, और
बैठने के लिए लकड़ी की बेंचें। जो बात मुझे सबसे ज्यादा याद है वो ये कि गर्मियों के
मौसम में टॉकीज तंदूर की तरह गर्म रहता और सर्दियों में फ्रिज की तरह ठंडा। सबसे
ज्यादा फिल्में मैंने इसी टॉकीज में देखीं। इसकी वजह ये थी कि यहां नई फिल्में नहीं
लगती थीं, पुरानी फिल्में ही बार-बार लगती रहती थीं। जो फिल्में तेरह बरस की उम्र
तक नहीं देखने दी गई थीं, वो बाद में यहीं देखीं। इस टॉकीज के कंपाउंड में एक
आइसक्रीम पार्लर भी हुआ करता था जहां थोड़ी ऊंचाई पर एक रंग-बिरंगा लकड़ी का

बंदर आइसक्रीम की बाल्‍्टी को इस तरह घुमाता रहता जैसे वो खुद ही आइसक्रीम बना
रहा हो। वहां की मैंगो आइसक्रीम बहुत मशहूर थी। मैंने आज तक उस जैसी
आइसक्रीम कहीं नहीं खाई। उन दिनों हमारे घर पर बहुत मेहमान आया करते थे,
खासकर मुंबई और पाकिस्तान से। मुझे अच्छी तरह याद है कि पाकिस्तानी मेहमान
आते ही हिंदी फिल्में देखने के लिए बेचैन हो जाते थे। अम्मी का काम था मेहमानों को
फिल्में दिखाना, शॉपिंग कराना और वापसी में मिल्कीवे की आइसक्रीम खिलाना। जब
पाकिस्तानी मेहमानों के वापस जाने का टाइम आता और अगर नई फिल्में लग जातीं
तो एक ही दिन में वो दो या तीन फिल्में भी देख डालते। कहीं ऐसा न हो कि कोई फिल्म
गलती से भी छूट जाए। लंदन आने के बाद तो मैंने कई लोगों से ये तक सुना कि अगर
हालात खराब होने की वजह से पाकिस्तान में हिंदुस्तानी फिल्में नहीं लगती थीं तो बहुत
लोग बॉर्डर पार करके अफगानिस्तान तक जाकर फिल्में देखकर आते थे।

बहरहाल, उस रोज जब मैंने काबुलीवाला देखी, तो मुझे बेहद पसंद आई। फिल्म
की कहानी एक पठान आदमी और एक छोटी बच्ची के बारे में थी। फिल्म में कई दुख
भरे मंजर भी थे जिन्हें देखकर कई बार रोना भी आया। पठान का किरदार बलराज
साहनी साहब ने बेहद खूबसूरती से निभाया था। उस फिल्म का एक गाना मुझे बेहद
पसंद आया, और उसकी मधुर आवाज, अंदाज, लय और लहजा मेरे दिलो-दिमाग पर
बड़ी गहरी छाप छोड़ गया। गाने के बोल थे आओ सबा कहना मेरे दिलदार को, दिल
तड़पता है तेरे दीदार को… जिसे मुहम्मद रफी साहब ने गाया था।

जैसे-जैसे मैं बड़ी हो रही थी, गीत-संगीत के प्रति मेरा शौक भी बढ़ता जा रहा था।
रेडियो पर गाने सुने बगैर कोई काम करना अच्छा ही नहीं लगता था। लेकिन मुश्किल ये
थी कि हमारे घर में एक ही रेडियो था और वो हमेशा बाबा के कब्जे में रहता था। उनके
लिए दुनिया में दो ही स्टेशन थे। एक तो बीबीसी जिस पर वो वर्ल्ड न्यूज सुनते, और
दूसरा पाकिस्तान रेडियो जिस पर वो गुलाम फरीद साबरी और मकबूल अहमद साबरी
की कव्वालियां सुनते। हालांकि मर्फी का ब्रांड न्यू रेडियो था जिसे आसानी से साफ
सुना जा सकता था, लेकिन वो यही कहते कि रिसेप्शन अच्छा ही नहीं है और हमेशा
परेशान रहते। मैं जब भी उनके कमरे के पास से गुजरती, तो देखती कि वो रेडियो का
एरियल ठीक करने में लगे हैं और खटर-पटर की आवाजें आ रही हैं। मैं सोचती इनकी
प्रॉब्लम क्या है, न तो खुद रेडियो ठीक से सुनते हैं न ही दूसरों को सुनने देते हैं। अम्मी
बेचारी चिढ़कर कहती, “मेरा तो रेडियो सुनने से दिल ही बुरा हो गया है।”

आखिर मैंने अपना शौक पूरा करने के लिए अलग रेडियो मांग ही लिया। बाबा ने
फौरन हां कह दिया और अपने लिए एक ट्रांजिस्टर ले आए जो अब हर वक्त घर के
अंदर और बाहर उनके साथ घूमने लगा। मेरी तो खुशी का ठिकाना नहीं रहा, फौरन ही

कमरे के शेल्फ पर लाकर रेडियो रख दिया। अब उस रेडियो की देखभाल मेरी
जिम्मेदारी थी। फौरन कपड़े का अच्छा सा गिलाफ बनाया गया, जिस पर कढ़ाई भी की
गई। गिलाफ भी बाकायदा नकाब वाला था, ताकि रेडियो सुन चुकने के बाद नकाब
ढक दी जाए और मेरे प्यारे रेडियो पर धूल न जमे। बचपन में हम चीजों की इस तरह
कद्र करते थे। अब तो हाल ये है कि अगर चीजों की कद्र करने को कहा जाए तो नई
पीढ़ी का जवाब कुछ इस तरह होता है, “नो वे, दैट्स सो टैकी!” रेडियो को इस्तेमाल
करते-करते मैं इतनी उस्ताद हो गई थी कि नींद में भी रेडियो लगाना हो तो मालूम रहता
था कि ऑल इंडिया रेडियो, विविध भारती, सीलोन वगैरा के लिए सूई कहां घुमानी है।

उस जमाने में मनोर॑जन का सबसे अच्छा साधन रेडियो ही था। गाड़ीवाले,
रिक्शावाले, साइकिलवाले, बैलगाड़ी और ठेलेवाले, हर किसी के पास ट्रांजिस्टर रेडियो
लटक रहे होते थे। और फिर तो जैसे होड़ सी शुरू हो गई थी, बड़े से बड़ा ट्रांजिस्टर
रखने की। जिसे देखो इंपोर्टेड खरीदकर ला रहा है या फिर बाहर से मंगवा रहा था। मैं
तो अपने ही रेडियो से बहुत खुश थी। रोज का रुटीन था सुबह स्कूल के लिए तैयार
होते-होते पुराने गाने सुनना। फिर स्कूल से आने के बाद भी यही रुटीन रहता, चाहे
होमवर्क कर रहे हों या खाना खा रहे हों, रेडियो का चलना ज़रूरी था।

____________________________________________________

उस जमाने में रेडियो पर एक बड़ा मशहूर प्रोग्राम बिनाका गीतसाला हर बुधवार
को शाम आठ बजे रेडियो सीलोन से आता था जिसमें हफ्ते के टॉप सोलह गाने बजाए
जाते थे। ये प्रोग्राम आज के “क्योंकि सास भी कभी बहू थी” और “कौन बनेगा
करोड़पति” जैसा ही लोकप्रिय था। बड़े तो बड़े, बच्चे भी इसे बड़े शौक से सुनते थे। इस
प्रोग्राम के प्रेजेंटर अमीन सयानी थे जिनका अपना ही एक खास अंदाज था जिसे लोग
आज तक भी भूले नहीं हैं। इस प्रोग्राम में एक तरह से उनका तकिया कलाम था
“अगली पायदान पर।” जैसे ही वो “अगली पायदान पर” बोलते, सुननेवाले अपने-अपने
अंदाजे लगाना शुरू कर देते। इंतजार में दिल की धड़कनें तेज होने लगतीं। जो भी गाना
जिसने कहा अगर चार्ट में वही आ गया तो वो खुशी से चिल्‍्लाने लगता, और अगर वो
नहीं आया तो आपस में बहस छिड़ जाती। कोई कहता, मैंने कहा था ना यही गाना
आएगा, तो कोई कहता मानते नहीं हो यार हमें मालूम था, और तीसरा कहता इसके
अलावा और कोई गाना हो ही नहीं सकता था, और फिर कोई और कह पड़ता अरे
भडया, मुझे मालूम था, क्यों जबरदस्ती बहस कर रहे थे। और फिर नंबर वन गाने पर
पहुंचते-पहुंचते शर्तें लगना शुरू हो जातीं। जहां तक मुझे याद है *50 और *60 के
दशक के ज्यादातर गाने रफी साहब के ही होते थे। बल्कि जहां तक मेरा ख्याल है, कई
बार तो बिनाका गीतमाला में सोलह के सोलह गाने एकल और युगल मिलाकर उन्हीं के
होते थे।

*50 के दशक के आखिर से मुझे गाने सुनने का शौक तो हो ही गया था, लेकिन
अब फिल्में देखने का भी शौक पैदा हो गया था। खासकर वो फिल्में जिनमें मुहम्मद
रफी साहब के गाने हों क्योंकि अब वो मेरे मनपसंद गायक बन चुके थे। फिल्में देखने
का शौक तब और भी बढ़ गया जब मेरे छोटे मामू (सलीम खां) अभिनेता बनने के लिए
मुंबई चले गए। मेरे बाबा की अभिनेता अजीत साहब से अच्छी दोस्ती थी। अजीत
साहब के जरिए उनकी मुलाकात डाइरेक्टर अमरनाथ साहब से हुई जो उन दिनों फिल्म
बारात बना रहे थे जिसके लिए उन्हें किसी नए चेहरे की तलाश थी। चेहरा नए के साथ-
साथ खूबसूरत भी हो तो भला कौन मना करता! लिहाजा सलीम मामू को फिल्म में
बतौर हीरो काम करने का मौका मिल गया। उन्होंने फिल्मों में प्रिंस सलीम के नाम से
कदम रखा। इसके बाद उन्होंने कई और फिल्मों में भी काम किया, जैसे रासू दादा
छैला बाढ़ सरहदी लुटेरे प्रोफेसर तीसरी मंजिल और फौलाद |

हालांकि उन्होंने फिल्म जगत में बतौर अभिनेता शुरुआत की थी लेकिन उन्हें सही
कामयाबी लेखक के रूप में ही मिली। पहले तो उन्होंने प्रिंस सलीम के ही नाम से
फिल्म दो धाई की कहानी लिखी। बाद में जावेद अख्तर साहब के साथ उनकी जोड़ी
सलीम-जावेद के नाम से बेहद मशहूर हुई। अब तो घर में सब लोग बिनाका गीतमाला
सुनने में और भी ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे। और अब तो खासतौर पर उन गानों का
ज्यादा इंतजार होता जो फिल्‍म में सलीम मामू पर फिल्‍्माए गए हों। मुझे तो इस बात
की और ज्यादा खुशी होती थी कि मेरे मामू ने फिल्म में मेरे फेवरीट गायक की आवाज
में गाने गाए हैं। बचपन फिल्म के गाने बिनाका गीतमाला में खूब बजे। मुझे तुमसे
मुहब्बत है मगर गैं कह नहीं सकता… और युगल गीत तेरे हम आओ सनम टू कहां मैं
कहां… गीतमाला में खूब बजे और चार्ट में नंबर वन तक भी पहुंचे।

जब मैंने फिल्म बरसात की रात के गाने रेडियो पर सुने, तो मुझे इतने पसंद आए
कि मेरा जी चाहा कि इस फिल्म को ज़रूर देखूं। लेकिन सवाल ये उठता था कि अम्मी
को इस बात के लिए मनाया कैसे जाए। मालूम तो था कि जवाब क्या होगा, फिर भी
जैसे-तैसे बड़ी हिम्मत करके अम्मी से पूछ ही लिया। “हरगिज नहीं! ये बच्चों के देखने
लायक फिल्म नहीं है,” जवाब मिला। ये सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया और मैं पैर
पटकती हुई अपने कमरे में चली गई। और उस रात मैंने गुस्से में खाना भी नहीं खाया,
और रोते-रोते सो गई। दूसरे दिन सुबह जब मैं स्कूल जाने के लिए घर से निकली, तो
देखा बाबा हमेशा की तरह गार्डन में बैठे अपने ट्रांजिस्टर से छेड़छाड़ कर रहे हैं। मैंने
दबी आवाज से सलाम किया और आगे बढ़ गई। तभी मैंने उन्हें कहते सुना, “आज मेरी
बेटी प्रिंसेस मार्गरेट का मूड ऑफ है। फिक्र मत करो, खुशी-खुशी स्कूल जाओ, मैं

तुम्हारी मां को मना लूंगा।” बाबा मुझे हमेशा प्रिंसेस मार्गरेट के नाम से बुलाते थे। न ही
मैंने कभी उनसे पूछा और न ही मुझे पता था क्यों।

उस दिन जब मैं स्कूल से वापस घर आई, तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। अम्मी
ने मुझसे कहा, जाओ, जल्दी कुछ खा-पीकर तैयार हो जाओ। छह बजे का शो देखने
चलेंगे। अम्मी के बोलने के अंदाज से मुझे लगा कि वो खुश नहीं हैं, और मैं सोचने लगी
कि इतनी आसानी से मेरी बात कैसे मान ली गई। तभी मुझे उनकी आवाज सुनाई दी।
वो मुझे अपने कमरे में आने को कह रही थीं। मैं उनके कमरे में गई, तो उन्होंने मुझसे
बैठने को कहा। और जैसे ही मैं बैठी, उनका लेक्चर शुरू हो गया। “मैं तुम्हें लेकर जा
तो रही हूं, लेकिन कान खोलकर सुन लो, मैं नहीं समझती कि ये बच्चों के देखने की
फिल्‍म है। लेकिन तुम अब बड़ी हो रही हो, पिक्चर सिर्फ दिल बहलाने के लिए देखी
जाती है, न तो मैं कभी कोई गलत बात सुनूं न देखूं।” और जनाब, ये पहली बार नहीं
हुआ; इसके बाद वो जब भी फिल्‍म दिखाने लेकर जातीं, साथ में एक लेक्चर मुफ्त में
मिलता। लेकिन हां, वक्त और उम्र के साथ लेक्चरों की अवधि छोटी होती गई। उस वक्त
तो अम्मी की बातें मुझे बड़ी बुरी लगती थीं, और उन्हें सुनने का दिल भी नहीं करता था।
लेकिन कानों के जरिए दिमाग के किसी कोने में वो बातें जमा ज़रूर होती गई जो बाद
में समझ में भी आईं, और काम भी आईं। खासकर तब जब मैं शादी के फौरन बाद
लंदन आ गई, और यहीं पर अपने चारों बच्चों की परवरिश की।

1956 के करीब मशहूर फिल्म नया दौर की सारी शूटिंग नर्मदा नदी के किनारे बसे
गांव बुधनी में हुई थी, जो भोपाल से ज्यादा दूर नहीं है। मेरे बाबा का नाम और कारोबार
भोपाल के आसपास के इलाकों तक फैला हुआ था। नया दौर की शूटिंग के दौरान
उनकी मुलाकात फिल्म के कलाकारों दिलीप कुमार, अजीत और जॉनी वॉकर से हुई।
जब तक वहां शूटिंग चली, बाबा ने इन लोगों को अपना निजी मेहमान मानकर इनकी
खूब खातिर-तवाजो की और साथ-साथ शिकार भी खिलाया। इस तरह इनमें दोस्ती
बढ़ी, और आपस में मिलना-जुलना और फिर आना-जाना शुरू हो गया। इसी बीच
शिकार के सिलसिले में शम्मी कपूर साहब से भी बाबा और मेरे चाचा की दोस्ती हुई।
शम्मी कपूर साहब को भी शिकार खेलने का बहुत शौक था। जॉनी चाचा और अजीत
चाचा से तो हमारे परिवार के बिल्कुल घर जैसे ताल्‍्लुकात हो गए थे।

मुझे तो ठीक से याद नहीं, लेकिन अम्मी-बाबा से अक्सर सुना था कि दिलीप
साहब जब भी हम दोनों बहनों को देखते तो हमें तंग करते और मजाक में कहते, “इन

दोनों मेमों जैसी गोरी-गोरी छोकरियों को पकडूंगा और एक का कोरमा बनाऊंगा और
एक का पुलाव, और फिर दोनों को खा जाऊंगा।” सुनकर मैं कहती, “और मैं भी
खाऊंगी।” लेकिन जब मैं समझदार हो गई, तब का मुझे याद है दिलीप चाचा से जब
भी मुलाकात होती तो वो इन्हीं अल्फाज को दोहराकर हमें छेड़ा करते थे।

फिल्में देखना मेरी अम्मी का जुनून था, खासकर वो फिल्में जिनमें दिलीप कुमार
हीरो हों और मुहम्मद रफी साहब के गाने हों। वो बताती थीं कि इन फिल्मों को किसी
भी हाल में पहले दिन देखना एकदम पक्की बात थी। 1948 में, अम्मी की शादी हो गई
और वो इंदौर से भोपाल रहने चली गईं, उस जमाने में भोपाल में पर्दे का बहुत रिवाज
था, और औरतें बुर्का पहने बगैर बाहर नहीं निकलती थीं। मुस्लिम घरानों की बुर्का न
पहनने वाली औरतों को अच्छा नहीं समझा जाता था या फिर बहुत ज्यादा आजाद
ख्याल होने का टैग दिया जाता था। चूंकि इंदौर शहर में इसका रिवाज नहीं था, इसलिए
अम्मी ने शादी से पहले कभी बुर्का नहीं पहना था। इंदौर वैसे भी फैशन, शॉपिंग और
सुविधाओं के लिहाज से मुंबई से किसी तरह कम नहीं था। इसीलिए इसे “मिनी मुंबई’
भी कहा जाता है।

_________________________________________________

अम्मी हमेशा इंदौर जाकर ही फिल्में देखा करती थीं। इसकी दो अहम वजहें थीं-
एक तो इंदौर आकर बुर्का नहीं पहनना पड़ता था, और दूसरे ये कि नव्वे के दशक के
शुरू तक सिर्फ इंदौर ही ऐसा शहर था जहां फिल्में जुम्मेरात को ही रिलीज हो जाती
थीं। फिर अम्मी भला एक दिन और भोपाल में क्यों इंतजार करतीं? भोपाल से इंदौर
तक का सफर सिर्फ तीन-चार घंटे का ही है। उस जमाने में बाबा का ट्रांसपोर्ट का
बिजनेस भी था, इसलिए आने-जाने का तो कोई मसला ही नहीं था। जैसे ही बस
सर्विस से फ्री होती, अम्मी-बाबा हम पांचों बच्चों और नौकरों को भी साथ लेकर
भोपाल से इंदौर फिल्‍म देखने के लिए आ जाते। जब तक वो फिल्‍म देखते, नौकर हम
भाई-बहनों की देखभाल करते। इस इंतजाम के पीछे वजह ये थी कि एक तो जब
ज़रूरत हुई बच्चों को देख लिया, दूसरी वजह जिसका ज्यादातर इल्जाम मुझे ही दिया
जाता था कि तुम सबसे ज्यादा जिद्दी थीं और रोती भी बहुत थीं, और किसी और के
हाथ से कुछ खाती-पीती नहीं थीं। एक बार मेरे नाना मेरी देखभाल करके भुगत चुके
थे, तब उन्होंने अम्मी की खूब खबर ली और कहा कि ये पिक्चर-विक्चर देखना छोड़ो
या फिर अपने बच्चों को साथ लेकर जाया करो। भला अम्मी को पिक्चर छोड़ना कब
मंजूर था? उन्होंने इसका भी तरीका निकाल ही लिया। वे हमें हॉल में अपने साथ लेकर
जाने लगीं और हमें बाहर उनका इंतजार करना पड़ता।

उस वक्त मैं काफी छोटी थी, लेकिन ये बात मुझे इस तरह याद है जैसे कल ही की
बात हो। हमारे भोपाल वाले घर में एक ग्रामोफोन लाया गया था जिससे हम बच्चों का
मन बहल जाया करता था। इस ग्रामोफोन के पास ही जमीन पर सैकड़ों रिकॉर्ड्स का
ढेर लगा रहता था। जो भी नया गाना निकलता उसका रिकॉर्ड फौरन घर आ जाता।
और जो गाना सबको पसंद आ जाए, वो तब तक बजाया जाता जब तक कि वो बेचारा
घिसकर दम ही न तोड़ देता। उन पसंदीदा गानों में से कुछ मुझे आज भी याद हैं: मैंने
चांद और सितारों की तमन्ना की थी … (चंद्रकांता, 1956), खोया खोया चांद खुला
आसमान … (काला बाजार, 1960), तू जो नहीं है तो कुछ भी नहीं है ये साना कि
सहफिल जवां है हसीं है … (गायक एस बी जॉन) |

मेरा सारा खानदान मुहम्मद रफी साहब की आवाज और उनके गाने के अंदाज
का पहले ही दीवाना था, अब इस लिस्ट में मेरा नाम सबसे ऊपर था। एक बार मेरे
स्कूल में गाने का मुकाबला रखा गया, और मैंने तय किया कि मैं ज़रूर हिस्सा लूंगी।
कुछ और लड़कियों ने भी हिस्सा लिया। सबको अपने-अपने गाने चुनकर तैयार करने
को कहा गया। सभी लड़कियों ने महिला गायकों के गाने पसंद किए, लेकिन मैंने कहा
कि मैं मुहम्मद रफी साहब का गाना गाऊंगी। ये सुनकर मेरे टीचर हंसने लगे, और कहने
लगे, अरे लड़की होकर मर्दाना गाना गाओगी। खैर, सबने अपने-अपने गाने गाए।
मुकाबला बड़ा सख्त था। जब मेरा नंबर आया, तो मैंने बार-बार दिन ये आए, बार-बार
दिल ये गाए गाकर सुनाया। और गाया ही नहीं, बल्कि रफी साहब की आवाज और
स्टाइल भी मारा। और मुझे फर्स्ट प्राइज मिला।

मुहम्मद रफी साहब की इतनी बड़ी फैन होते हुए भी मैं ये नहीं जानती थी कि वो
दिखते कैसे हैं और उनकी उम्र क्या होगी। किसी भी फिल्‍मी मैगजीन में न तो उनकी
तस्वीरें आती थीं और न ही कोई इंटरव्यू। वैसे भी उस जमाने में हमारे घर पर कोई
फिल्‍मी मैगजीन वगैरा आती भी नहीं थी। बच्चों को कभी-कभी फिल्म दिखा दी जाती
थी, यही बहुत बड़ी बात थी। रफी साहब के गाने सुन-सनकर और गा-गाकर मेरे दिमाग
में एक छवि सी बन गई थी। मैं सोचती थी कि ऐसी जादू भरी आवाज का मालिक
देखने में किसी हीरो से कम नहीं होगा और बीस-बाईस साल के आसपास का होगा।
उस जमाने में तो ये हाल था कि जो भी हीरो पसंद आता, उसका फोटो कहीं न कहीं से

ढूंढडकर या फिर किसी दोस्त से मांगकर स्कूल की नोटबुक पर उसका कवर चढ़ा दिया
जाता। और वो कवर तब तक नहीं बदलता, जब तक उस हीरो की जगह कोई और
नहीं ले लेता। तो दिलीप कुमार, देव आनंद, राजेंद्र कुमार, शग्मी कपूर, धर्मेद्र, शशि
कपूर, मनोज कुमार, जितेंद्र, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन सभी बदलते वक्त के साथ
नोटबुकों की जीनत बनते रहे। वक्त और उम्र के साथ मेरी पसंद बदलती रही, लेकिन
एक पसंद अपनी जगह पर बनी रही और वो पसंद थी मुहम्मद रफी साहब के गाने और
वही पसंद आज तक बरकरार है।

अब वो दिन बीत चुके थे जब मुझ पर हर कोई फिल्म देखने पर पाबंदी होती थी।
मेरी उम्र अब अठारह साल की थी। 1969 में मैंने फिल्म आराधना देखी जो सुपर हिट
हुई। इस फिल्‍म को बेहद पसंद किया गया और इस फिल्म के हीरो राजेश खन्ना
रातोरात सुपर स्टार बन गए। मैंने अपनी जिंदगी में किसी भी एक्टर का इतना ज्यादा
क्रेज कभी नहीं देखा, जैसा उनका देखा था। लड़के तो लड़के, लड़कियां भी राजेश
खन्ना के अंदाज में बात करने लगी थीं, और उनकी आखों के उस खास इशारा करने
की अदा की नकल करने लगी थीं। इस फिल्‍म के सभी गाने भी बेहद पसंद किए गए।
इसी फिल्‍म से किशोर कुमार साहब को एक गायक के रूप में कामयाबी हासिल हुई।
उनके गाए हुए दो गाने मेरे सपनों की रानी कब आएगी दू.. और रूप तेरा सस्ताना
प्यार मेरा दीवाना… बेहद पसंद किए गए। किशोर कुमार मेरे लिए नए सिंगर नहीं थे, मैं
बचपन से उनके गाए गाने सुनती आ रही थी, जैसे सहगल, रफी, तलत महमूद, मुकेश,
मन्ना डे, हेमंत कुमार, महेंद्र कपूर, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, गीता दत्त, सुरैया,
शमशाद बेगम और नूरजहां वगैरा के गाने सुनती आ रही थी। खासकर किशोर कुमार
का गाना खुश है जयाना आज पहली तारीख है.. (फिल्म पहली तारीख, 1954) मुझे
बेहद पसंद था। ये गाना हर महीने की पहली तारीख को रेडियो सीलोन पर ज़रूर
बजता था। याद न भी हो, तो इस गाने को सुनते ही याद आ जाता था कि आज पहली
तारीख है। अराधना फिल्म के दो और गाने हिट हुए और इन्हें रफी साहब ने गाया था
जो मेरे पसंदीदा गायक थे। एक लता मंगेशकर के साथ बागों में बहार है कलियों पे
निखार है… और दूसरा आशा भोंसले के साथ गाया हुआ गुनगुना रहे हैं भंवरे खिल रही
है कली-कली… । दूसरे क्या सुन रहे थे, क्या गा रहे थे या क्या कुछ कह रहे थे, मुझे
इससे कोई मतलब नहीं था, मेरी जबान पर तो बस अब सुबह-शाम यही गाने थे।

उस दिन फिल्‍म आराधना देखने के बाद तो बस पूछिए मत क्या हुआ। राजेश
खन्ना ने हम सब भाई-बहनों पर ऐसा असर किया कि वो सिनेमा हॉल से हमारे घर तक
आ पहुंचे, जिस तरह वो करोड़ों दूसरे हिंदुस्तानियों के घरों तक पहुंच गए थे। मेरे छोटे
भाई (जिनके प्यार का नाम गुल्लू था) का तो ये हाल हुआ कि उस दिन से उनका सारा

हुलिया ही बदल गया। वो गुल्लू कम और राजेश खन्ना ज्यादा हो गए। फिल्म स्टार का
पोस्टर तो घर में लगाने का सवाल पैदा नहीं होता था, लेकिन कहीं न कहीं से राजेश
खन्ना की तस्वीर मांगकर या अखबार से निकालकर मैं भी स्कूल नोटबुक पर चढ़ा लेती
थी। अब राजेश खन्ना हीरो की फेवरीट लिस्ट में सबसे ऊपर थे। अब मुझे इंतजार था
कि जब भी छुट्टियों में मुंबई जाएंगे तो राजेश खन्ना से तो ज़रूर ही मिलकर आएंंगे।

ये बात अप्रैल 1970 की है। स्कूल का आखरी साल था। हमारे इम्तहान खत्म हो
चुके थे। दोस्तों से बिछड़ने का बड़ा गम था। लेकिन इस बात का एक्साइटमेंट भी था
कि गर्मी की छुट्टियों के बाद कॉलेज की नई जिंदगी शुरू होगी जिसमें ज्यादा आजादी
मिलेगी और पढ़ाई के घंटे भी मर्जी के होंगे। और सबसे अच्छी बात तो ये होगी कि
स्कूल की यूनिफॉर्म से पीछा छूट जाएगा, जो मुझे जहर लगती थी। रोज नए-नए कपड़े
पहनकर कॉलेज जा सकूंगी। लेकिन जानते हैं अब मैं क्या सोचती हूं? अगर हर घर की
एक यूनिफॉर्म हो जाए, तो ये मसला ही हल हो जाए। फिर रोज-रोज की ये फिक्र खत्म
हो जाएगी कि अभी तो उनके घर पर ये कपड़े पहने थे, दोबारा फिर से कैसे पहन लूं,
या इनके घर पर भी वही सारे लोग होंगे, अब दोबारा इन्हीं कपड़ों को पहनकर वहां
कैसे जाऊं? बहरहाल, अब सबसे अहम सवाल सामने ये था कि छुट्टियां कहां गुजारी
जाएं। अम्मी-बाबा बचपन से ही कहीं न कहीं घुमाने ज़रूर ले जाते थे। खासकर गर्मियों
की छुट्टियों में अगर कहीं और का प्रोग्राम न भी बन सका, तो भोपाल और खंडेरा
(हमारा गांव) या फिर मुंबई तो ज़रूर जाते थे। मुझे और मेरी छोटी बहन फौजिया से
अगर नींद में भी पूछा जाता कि कहां घूमने जाना है, तो मुंह से फौरन मुंबई ही
निकलता। मुंबई जाना हमेशा से हमारी पहली पसंद था, और आज भी है, लेकिन अब
सिर्फ थोड़े दिनों के लिए। बचपन में यूं भी ज्यादा अच्छा लगता था, शौक था कि फिल्म
स्टारों से मिलेंगे, शूटिंग देखेंगे, शॉपिंग करेंगे और हापुस आम भी खाएंगे। शॉपिंग और
हापुस तो आज भी बेहद पसंद हैं। मेरे तीनों भाइयों (जिनके प्यार के नाम शैरी, गुल्लू
और भोलू हैं, और ये अब इन्हीं नामों से ज्यादा जाने जाते हैं) को भोपाल और खंडेरा
जाने में ज्यादा दिलचस्पी होती थी क्योंकि वहां उन्हें शिकार पर जाना, मछली पकड़ना,
और नदी-तालाबों में नहाना, तैरना वगैरा ज्यादा पसंद था। लेकिन मैंने जिद पकड़ ली
कि मुझे तो मुंबई ही जाना है। भला बाबा मेरी बात कैसे टाल सकते थे, हमारी खुशी के
लिए वो भी साथ चलने को तैयार हो गए। वैसे भी, जब बाबा साथ हों, तो छुट्टियों का
मजा ही दोबाला हो जाता था। तीनों भाई भोपाल चले गए, और हम लोग मुंबई आ
गए।

________________________________________________

फिल्म दास्तान की शूटिंग पर हम लोग बाबा के साथ दिलीप साहब से मिलने
स्टूडियो पहुंचे। सैट पर शर्मिला टैगोर भी थीं, उनसे भी हमारी मुलाकात करवाई गई। मैं
चुपचाप टकटकी लगाए शूटिंग देख रही थी। जैसे ही शॉट खत्म हुआ, दिलीप चाचा
हमारे पास आए और हाल-चाल पूछने के बाद हंसकर बोले, “तो अब बताओ,
छोकरियो, मैं ज्यादा पसंद हूं कि राजेश खन्ना?” आसपास खड़े लोग भी सुनकर हंसने
लगे। मैंने हिम्मत करके कहा, “नहीं, वो सब तो आपके बाद हैं।” अम्मी तो एकदम दिल
पे ले गईं। कहने लगीं, “अरे साहब! सवाल ही नहीं पैदा होता!”

उन्हीं दिनों अंदाज फिल्म भी बन रही थी जिसमें शम्मी कपूर, राजेश खन्ना और
हेमा मालिनी ने काम किया था। हम बड़ी खुशी-खुशी अंदाज के सैट पर पहुंचे, लेकिन
वहां न तो शूटिंग देख सके और न ही सुपर स्टार राजेश खन्ना से मुलाकात हो सकी।
बड़ा बुरा लगा। लेकिन बाबा के दोस्त शम्मी कपूर चाचा से हमारी मुलाकात ज़रूर हुई।
उनके साथ हमने फोटो वगैरा भी खिंचवाए। जाहिर है, मुलाकात का सुबूत भी तो होना
चाहिए, वर्ना हम दोस्तों के सामने कैसे इतराएंगे? अब थी राजेश खन्ना से मिलने की
बारी। उनसे मिले बगैर अगर मुंबई से लौट जाती, तो दोस्तों को क्या मुंह दिखाती? हमने
डुल्लू मामू (सलीम खां) की खूब मित्नतें की। बड़ी मुश्किल से वो हमें लेकर जाने के
लिए राजी हुए। राजेश खन्ना कार्टर रोड पर अपने नए बंगले आशीर्वाद में रह रहे थे जो
कान्तवाड़ी से ज्यादा टूर नहीं था। हम लोग शाम करीब छह बजे टहलते हुए उनके घर
पर पहुंचे। उन्होंने खुश होकर बड़ी इज्जत के साथ हमारा स्वागत किया। अब इससे
ज्यादा और क्या चाहिए था? उन्होंने हमें अपना बंगला भी घुमाया जो हाल ही में बनकर
तैयार हुआ था। वाकई बहुत ही खूबसूरत बंगला बनाया था। जब हमने उनका बेडरूम
देखा, तो खिड़की से बाहर सामने सारा समुद्र नजर आ रहा था। और उस वक्त सूरज
भी समंदर में डूब रहा था। बेड का फ्रेम कुछ इस तरह बनाया गया था कि गद्दे को
जमीन पर ही रखा गया था। उस वक्त राजेश खन्ना हमारे फेवरीट हीरो थे तो उनकी हर
चीज पर हमारा ध्यान क्‍यों न जाता। बेड को देखकर मेरे मुंह से निकला, “जमीन पर
बिस्तर?” तो राजेश खन्ना ने बिल्कुल उसी अंदाज में जवाब दिया जिस अंदाज में वो
फिल्‍म आनंद में अमिताभ बच्चन को “बाबू मोशाय” कहकर बुलाते थे, “मैं तो गरीब
आदमी हूं, जमीन पर ही सोता हूं।” उसके बाद उन्होंने हमसे अचानक पूछा, “बताइए
आप दोनों को मैं अच्छा लगता हूं या दिलीप कुमार?” ये सुनकर हम थोड़े खिसिया से
गए और एक-दूसरे को देखकर हंसने लगे। लेकिन फिर सोचने लगे कि ये बात इतनी
जल्दी यहां कैसे पहुंच गई। खैर, इससे हमें क्या लेना-देना था, और न ही हमें बॉलीवुड
की सियासत से कोई दिलचस्पी थी। बस हमें तो खुशी थी कि हमारा अरमान पूरा हो
गया।

खैर साहब। अंदाज रिलीज हुई। उसके गाने तो पहले ही बहुत मशहूर हो चुके थे।
खासकर किशोर साहब का गाया हुआ जिदंगी एक सफर है सुहाना… । जब मैंने फिल्म
देखी तो ये गाना सुनकर मुझे मजा ही आ गया। जिंदगी एक सफर है सुहाना… गाना
मुहम्मद रफी साहब की आवाज में भी शम्मी कपूर साहब पर फिल्‍्माया गया था। (ये
गाना सिर्फ फिल्म के साउंड ट्रैक पर ही है।) क्या गाया है, सुब्हानल्लाह। पिक्चर के पैसे
वसूल हो गए।

स्कूल के बाद मैंने गर्ल्स डिग्री कॉलेज में एडमीशन ले लिया। 1971 में मैंने बीए के
पहले साल का इम्तेहान दिया था। कॉलेज की लंबी छुट्टियां हो गई थीं। मेरा दिल फिर से
मुंबई जाने का था लेकिन अम्मी-अब्बा ने तय किया कि इस बार हम साथ में भोपाल,
खंडेरा में छुट्टियां गुजारेंगे। मुझे अच्छा तो नहीं लगा लेकिन करती भी क्या। फिर
अचानक दो दिन बाद प्रोग्राम बदल गया। अम्मी ने बताया कि मेरे तीनों भाई तो
भोपाल, खंडेरा जा रहे हैं लेकिन अम्मी-बाबा के साथ हम दोनों यानी मैं और फौजिया
मुंबई जाएंगे। मेरी खुशी का कोई ठिकाना न रहा। मुंबई जाने की मेरी मुराद जो पूरी हो
रही थी। मुंबई तो हम लोग अक्सर जाते रहते थे लेकिन इस बार मामला मुझे कुछ
अलग सा लग रहा था। अम्मी हर बार की बनिस्बत कुछ ज्यादा ही तैयारी कर रही थीं।
कुछ-कुछ तो मुझे समझ आ रहा था, लेकिन मैंने उनसे पूछ ही लिया। अम्मी ने उस
वक्त तो सिर्फ हमें इतना ही बताया कि तुम्हारे मामू का फोन आया था। कह रहे थे कि
तुम लोग मुंबई आ जाओ। यहां पर मैंने एक रिश्ता भी देखा है। उन लोगों से मुलाकात
भी कर लेना।

बहरहाल! सोलह साल की उम्र से ही मेरे रिश्ते आना शुरू हो गए थे। फिर मैं ये
सुन-सुनकर ही बड़ी हो रही थी कि जैसे ही कोई अच्छा रिश्ता मिलेगा, तुम्हारी शादी
कर देंगे। लेकिन मजे की बात तो ये थी कि जब भी कोई रिश्ता आता, तो बाबा उसमें
कोई दिलचस्पी ही नहीं लेते थे और किसी न किसी बहाने टाल ही देते थे। ऐसा लगता
था जैसे उन्होंने इस बारे में कुछ पहले से ही सोच के रखा हो। अम्मी उनके इस रवैये से
परेशान हो जाती थीं। पता नहीं क्या सोच रखा है, हरेक को मना कर देते हैं। आखिर
लड़कियों की शादी करनी है या नहीं? बाबा उनसे कहते, तुम्हें इस बारे में फिक्र करने
की ज़रूरत नहीं, रिश्ता इंशाल्‍्लाह आएगा और बहुत जबरदस्त रिश्ता आएगा। बाबा
हम दोनों बहनों से बेहद प्यार करते थे। उन्हें बेटियां जान से भी प्यारी थीं। भाइयों से
ज्यादा वो हमारी पसंद और ज़रूरत का ख्याल रखते थे। लेकिन पता नहीं क्यों मुझे

हमेशा ऐसा लगता था कि जब हमारी शादियों का वक्त आएगा तो पता नहीं हमसे इस
बारे में कुछ पूछा भी जाएगा या नहीं?

युवा मुहम्मद रफ़ी
पत्नी बिलक़ीस के साथ
लेखिका यासमीन के पिता, मिर्जा अब्दुल हमीद ख़ान अपनी छोटी बेटी फ़ौज़िया की
सगाई के अवसर पर सलीम ख़ान और रफ़ी के साथ

शादी के बाद इंदौर से मुंबई के सफ़र के दौरान, बिलक़ीस और
की मेहंदी को सराहते हुए

मुहम्मद रफ़ी यासमीन
बेटे शाहिद (बीच में) की सालगिरह पर उसके साथ (बाएं से दाएं) यासमीन, बिलक़ीस,
मुहम्मद रफ़ी और नसरीन
कल ले
हि निफ़ाययादी प्य्य्या

एक इतवार की सुबह बेटे ख़ालिद के साथ मुहम्मद रफ़ी अपने रिकॉर्डों की सार-संभाल
करते हुए

लंदन में (बाएं से दाएं) यासमीन, मुहम्मद रफ़ी और ख़ालिद
लंदन में कारों के अपने शौक़ को पूरा करने में मशगूल
हमीद भाई के साथ कोक और हंसी-मज़ाक़ का लुत्फ़ उठाते
सुनाते हुए

रफ़ी विला में – ख़ालिद को कुछ ख़ास सुना

दो अज़ीम शख़्सियतें: संगीतकार नौशाद अली के साथ मुहम्मद रफ़ी
दिलीप कुमार के साथ एक गीत पर सलाह-मशविरा करते हुए
सितारों का जमघट: शंकर, मुहम्मद रफ़ी और जयकिशन, पृथ्वीराज कपूर और उनकी
पत्नी का अभिवादन करते हुए

ताज महल होटल, मुंबई में यासमीन और ख़ालिद की शादी के समारोह में लता
मंगेशकर और मदन मोहन के साथ

लंदन में (बाएं से तीसरे) किशोर कुमार और अपने बेटों के साथ

ख़ालिद और यासमीन की शादी के समारोह में मुहम्मद रफ़ी और एस.डी. बर्मन,
बिलक़ीस के साथ
मुंबई के एक स्टूडियो में आशा भोंसले के साथ एक गीत की रिकॉर्डिंग करते हुए
मुहम्मद रफ़ी.
मंच के बेमिसाल अदाकार: मशहूर

गीत “ओ दुनिया के रखवाले” गाते हुए मुहम्मद रफ़ी
सुनहरा दौर: अपने सा्जिंदों के साथ मंच पर मुहम्मद रफ़ी
एक हरदिल अज़ीज़ की अपने दिलअज़ीज़ से एक मुलाक़ात: मुहम्मद अली बनाम
मुहम्मद रफ़ी
साथ में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जिन्होंने शुरूआती दिन